मनमोहन सिंह ‘दानिश’
अगर जिंदगी में रोना ज़रूरी न होता तो कुदरत हमें आंसू देती ही ना। आंसू या रोना किसी कमज़ोरी या कायरता का प्रतीक नहीं बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति है। मशहूर फिल्मी शायर आनंद बक्शी ने क्या खूब लिखा है:
” अगर दिल में ग़म हो तो रोते हैं आंसू,
खुशी में भी आँखें भिगोते हैं आंसू
इन्हें जान सकता नहीं ये ज़माना”रोने का अर्थ है कि आप इंसान हैं जिसमें भावनाएं हैं। कल्पना कीजिए कि अगर कुदरत ने हमें रोना न दिया होता तो बच्चा मां को कैसे बताता कि वह भूखा है। दुनिया से जो तनाव आपको मिलते हैं, विफलताएं आपके हिस्से आते हैं, घरों में मरने जीने के दुख आपको घेर लेते हैं तो उनसे छुटकारा पाने के लिए रोना, या अश्क़ बहाना ज़रूरी हो जाता है। तो खुल के रोइए, और दिल के बोझ को आंखों के रास्ते निकाल फेंकिए।
यह भी बहुत गलत धारणा है कि मर्द रोते नहीं, रोने का मर्दानगी से कुछ लेना देना नहीं। हम सभी ने कभी न कभी गुंडे, मवाली, डाकू लुटेरों को भी रोते हुए देख होगा या उनके बारे में सुना होगा। कहा जाता है कि रोने से आंखों की सुंदरता बढ़ती है। यह बात कितनी सही है यह तो नहीं जानता पर रोने से दिल का बोझ ज़रूर खत्म होता है।
बात केवल दुख में रोने की ही नहीं बल्कि अत्याधिक खुशी में भी आँखें छलक आना आम बात है क्योंकि रोना या आंसू आना सीधे सीधे हमारी भावनाओं से जुड़ा है। तो दोस्तो रोने में शर्म महसूस न करें। अपने ग़मों, अपनी खुशियों, दोनों को ही अपनी आंखों से बयां होने दें। इससे आपका जीवन तनावमुक्त और खुशगवार बनेगा। अंत में मैं आप को हसरत जयपुरी साहब के एक पुराने गीत की इन पंक्तियों के साथ छोड़े जाता हूं:” ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं
मै रोऊँ तो रो दें आंसू मैं हंसदू तो हंस दें आंसू, ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं”
संपादकीय लेख
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