संजय कुमार मिश्रा
ऐसा इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि हाल ही में जी ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी वाले ₹22,006 करोड़ के कर्ज मामले में एनसीएलटी ने सिर्फ ₹6.25 करोड़ का सेटलमेंट प्लान मंजूर किया है।
सुभाष चंद्रा के सेटलमेंट से बैंक नाराज है और कई बड़े बैंक अब उपरी कोर्ट / ट्रिब्यूनल में चुनौती देने की तैयारी में हैं।
मंगलवार को एनसीएलटी की दिल्ली बेंच ने सुभाष चंद्रा के प्रस्तावित सेटलमेंट प्लान को मंजूरी दी। इसके तहत मुख्य कर्जदार कंपनियों की ओर से कुल करीब ₹1,494 करोड़ का भुगतान किया जाना है। वहीं, व्यक्तिगत गारंटर सुभाष चंद्रा को अपनी ओर से सिर्फ ₹6.25 करोड़ का भुगतान करना होगा। इस प्रस्ताव को क्रेडिटर्स की कमिटी ने 80.8 प्रतिशत वोट के बहुमत से मंजूरी दी। हालांकि, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, आरबीएल बैंक और यूनियन बैंक सहित कई प्रमुख ऋणदाताओं ने प्रस्ताव का विरोध किया।
विरोध कर रहे क्रेडिटर्स का मुख्य तर्क है कि कुल ₹22,006 करोड़ के क्लेम के मुकाबले व्यक्तिगत गारंटर की ओर से केवल ₹6.25 करोड़ का भुगतान बेहद कम है।
हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों का कहना है कि पूरे ₹22,006 करोड़ को सुभाष चंद्रा का व्यक्तिगत कर्ज मानना सही नहीं होगा। यह रकम उन सभी कंपनियों के कुल कर्ज से जुड़ी है, जिनके लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी।
इससे पहले भारतीय जीवन बीमा निगम पर अडाणी ग्रुप में 3.9 अरब डॉलर यानी करीब 33 हजार करोड़ रुपए निवेश करने का बड़ा आरोप लगा था। कांग्रेस ने अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के हवाले से कहा कि बीमा कंपनी ने अडाणी ग्रुप को फायदा पहुंचाने के लिए मई 2025 में यह निवेश किया। पार्टी का कहना है कि ग्राहकों की मेहनत की कमाई का गलत इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस ने संसद की पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) से इसकी जांच की मांग की है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा – यह घोटाला बहुत बड़ा है इसमें कई बातें शामिल हैं…
सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग: प्रवर्तन निदेशालय (ED), सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) और इनकम टैक्स विभाग को इस्तेमाल करके दूसरी निजी कंपनियों पर दबाव डाला गया और उन्हें मजबूर किया गया कि वे अपनी संपत्ति अडाणी ग्रुप को सस्ते में बेच दें।
संपत्तियों का गलत निजीकरण: हवाई अड्डे, बंदरगाह जैसी जरूरी चीजें सिर्फ अडाणी ग्रुप को फायदा पहुंचाने के लिए बेची गईं। इसमें धांधली हुई।
विदेशी सौदों में मदद: भारत की कूटनीति का इस्तेमाल करके पड़ोसी देशों में अडाणी को कॉन्ट्रैक्ट दिलवाए गए। जैसे बांग्लादेश या श्रीलंका में।
कोयले की महंगाई का खेल: अडाणी ग्रुप ने शेल कंपनियों के जरिए महंगा कोयला आयात किया। यह मनी लॉन्ड्रिंग का नेटवर्क था। इससे गुजरात के अडाणी पावर प्लांट से बिजली की कीमतें बढ़ गईं।
चुनाव से पहले बिजली के सौदे: मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में चुनाव से पहले अडाणी को ऊंची कीमतों पर बिजली सप्लाई के कॉन्टैक्ट दिए गए। और हाल ही में बिहार में, जहां चुनाव होने वाले हैं, एक पावर प्लांट के लिए जमीन सिर्फ 1 रुपए प्रति एकड़ में आवंटित कर दी गई।
TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के आधार पर बाताया है, जिसके अनुसार गौतम अडाणी जब इस साल की शुरुआत में भारी कर्ज में डूबे थे, अमेरिका में घूसखोरी के आरोपों का सामना कर रहे थे तब केंद्र सरकार के दवाब में LIC ने अडाणी ग्रुप में निवेश किया ।
दुूसरी तरफ LIC ने रिपोर्ट को गलत बताया है LIC ने वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट को नकार दिया है। कंपनी ने साफ किया है कि उसके सारे निवेश पूरी ईमानदारी और सावधानीपूर्वक जांच के साथ ही किए जाते हैं। LIC ने कहा कि रिपोर्ट में बताए गए किसी भी डॉक्यूमेंट या प्लान को LIC ने कभी तैयार नहीं किया, जो LIC के अडाणी ग्रुप में निवेश के प्लान को बताती हो। कंपनी ने कहा कि ये रिपोर्ट LIC की मजबूत और साफ-सुथरी फैसला लेने की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने, कंपनी की अच्छी इमेज को खराब करने और भारत के मजबूत वित्तीय क्षेत्र की बुनियाद को खराब करने के मकसद से जारी की गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भ्रष्टाचार के खिलाफ 2014 में दिया गया “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” का नारा राजनीतिक विरोधियों और आलोचकों द्वारा विफल करार दिया जा रहा है। विपक्षी दल जैसे कांग्रेस और अन्य पार्टियां यह दावा करती हैं कि यह नारा अब एक “जुमला” साबित हो रहा है।
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