मनमोहन सिंह ‘दानिश’
भारत ने जापान में खेली जा रही एशियाई खेलों की कबड्डी स्पर्धा में महिला और पुरुष वर्ग, दोनों में गोल्ड मेडल जीत कर इस खेल पर अपनी बादशाहत बरकरार रखी है। इन दोनों टीमों ने फाइनल में ईरान को परास्त किया। महिला टीम में हिमाचल प्रदेश की चार खिलाड़ी थी। इस छोटे से प्रदेश के लिए यह गौरव की बात है। उधर पुरुष टीम में अधिकतर खिलाड़ी हरियाणा से थे। अभी तक भारत ने जो चार गोल्ड मेडल जीते हैं उनमें से दो कबड्डी में एक महिला क्रिकेट में और एक निशानेबाजी की मिक्स्ड टीम स्पर्धा में आया है। खैर अभी भारत की झोली में कुछ और गोल्ड जीतने की उम्मीद बरकरार है।
कबड्डी के सभी मैच देखने के बाद यह बात स्पष्ट होती है कि इस खेल को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए इसके टीवी रेफरल को बने नियमों में बदलाव ज़रूरी है। दूसरे, इसकी ऑफिशिएटिंग के स्तर को सुधारना होगा। मिसाल के तौर पर महिला वर्ग में भारत ईरान का मैच लेलें। इस मैच का 15 मिनट का पहला हॉफ लगभग 25 मिनट में खत्म हुआ। कारण था बहुत ही निम्न स्तर की ऑफिशिएटिंग। रैफरी और अंपायर ने बीच तालमेल की कमी। इस कारण हर निर्णय के लिए बार बार टीवी अंपायर की मदद ली जा रही थी। और उसमें भी बहुत लंबा समय लग रहा था। टीवी अंपायर की मदद क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन और फुटबॉल में भी ली जाती है।
क्रिकेट के आईपीएल को छोड़ दें तो आधिकारिक मैचों में एक टीम को एक पारी में तीन रेफरल लेने की इजाज़त होती है। हॉकी में तो टीम को केवल एक रेफरल मिलता है। जहां उनका एक रेफरल ग़लत हुआ वहीं उनका रेफरल लेने का अधिकार समाप्त हो जाता है। पर कबड्डी में तो हर फैसला रेफर किया जाता है। अगर हर फैसला टीवी अंपायर को करना है तो फिर फील्ड पर अंपायर और रेफरी की ज़रूरत क्या है। ईरान की टीम भारत की लय तोड़ने के लिए बार बार टीवी रेफरल मांगती रही। अब उसके रेफरल सही या ग़लत थे कुछ समझ में नहीं आया। पुरुष वर्ग में भी कुछ अजीबोगरीब फैसले देखने को मिले। पर वहां ऑफिशिएटिंग का स्तर महिला वर्ग के मैचों से थोड़ा बेहतर था।
ऑफिशिएटिंग के स्तर को सुधारने के लिए ज़रूरी है कि घरेलू मैचों में भी टीवी अंपायर को रखा जाए ताकि फील्ड अंपायर अधिक अनुभव हासिल कर सकें। असल में अधिकतर घरेलू टूर्नामेंट्स में तो टीवी अंपायर होता नहीं, तो जो फैसला ऑन फील्ड रेफरी और अंपायर ने दे दिया वो अंतिम है। इस खेल की पवित्रता और निष्पक्षता को बनाए रखने के ज़रूरी है कि अंपायर और रेफरी के प्रशिक्षण पर अधिक मेहनत की जाए। उन्हें नियमों और हर नियम की मंशा से अवगत कराया जाए और उनकी गलतियों और कमियों को देखने के लिए हर घरेलू टूर्नामेंट्स में भी टीवी अंपायर की व्यवस्था हो। साथ ही हॉकी की तरह एक रेफरल ग़लत निकाने पर उस टीम को दुबारा रेफरल लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। फील्ड अंपायर अपनी तसल्ली के लिए टीवी अंपायर की मदद ले सकता हो।
अब थोड़ी बात खिलाड़ियों के व्यवहार की। ईरान के साथ भारत के महिला वर्ग के मैच में जिस तरह का शोर शराब खासकर ईरान की टीम कर रही थी उसकी इजाज़त नहीं होनी चाहिए। क्रिकेट में तो अंपायर के फैसले पर अगर खिलाड़ी के चेहरे के हावभाव भी सही नहीं रहते तो भी उसे अनुशासनहीनता माना जाता है। कबड्डी में तो ईरानी खिलाड़ी हर उस फैसले पर जो उनके खिलाफ जाता था, उछल उछल के रेफरी और अंपायर से लगभग झगड़ा कर रही थी। एक किस्म से मच्छी बाजार का नज़ारा होता था। कबड्डी की साख बरकरार रखने के लिए और इसे ओलंपिक खेल बनाने के लिए इसके नियमों में कुछ बदलाव करना ज़रूरी है।
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