Saturday, 03 October 2026
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प्रगति की अंधी दौड़ और दम तोड़ती प्रकृति

– रोशन लाल ‘रौशन’

​आज का मानव आधुनिकता और विकास की ऐसी अंधी दौड़ में दौड़ रहा है जहाँ रफ्तार तो लगातार बढ़ रही है, लेकिन जीवन और पर्यावरण की सुरक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। एक समय था जब मनुष्य प्रकृति का आदर मान करता था और उसके साथ सामंजस्य बिठाकर जीवन व्यतीत करता था। परंतु आज ‘विकास’ के छलावे में आकर हम अपनी ही जीवनदायिनी प्रकृति को नष्ट करने पर तुले हैं।

​कंक्रीट के जंगल उगाने की चाह में असली जंगल सिमटते जा रहे हैं। विशाल पर्वतों का सीना चीरकर धाराशायी किया जा रहा है और हमारी पवित्र नदियाँ कचरे व उद्योगों के विषैले निकास के मिलावट से नाला बनकर रह गई हैं। अधिक उत्पादन के लोभ में रसायनिक खादों व कीटनाशकों की भरमार से तथा मिलावटी खाद्य पदार्थों से जीवन दूषित होता जा रहा है।

इसका नतीजा यह है कि जलवायु परिवर्तन भीषण आपदाओं का रूप लेकर हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है। यह अत्यंत विरोधाभासपूर्ण है कि मनुष्य मंगल ग्रह पर आशियाना बसाने के सपने देख रहा है, जबकि जिस धरती ने उसे जीवन दिया, वहाँ का ‘मंगल’ (कल्याण) समाप्त करने पर उतारू है।
​अन्य ग्रहों पर जीवन तलाशने से पहले हमें अपनी इस सुंदर वसुंधरा को मंगलमय और सुरक्षित बनाने को प्राथमिकता देनी होगी। प्रकृति से खिलवाड़ बंद करके ही हम अपना और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं। जब तक हम प्रकृति को पुनः आत्मसात नहीं करेंगे, तब तक सच्चा विकास और खुशहाली असंभव है।

​कुदरत से खिलवाड़ करके, तू कैसी तरक्की पाएगा?
जब उजड़ जाएगी धरती, तो मंगल पर क्या खाएगा?
संभालो इस वसुंधरा को, अभी भी वक्त बाकी है,
जो आज संभल गया इंसान, तो कल मुस्कुराएगा।