Thursday, 18 June 2026
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अलविदा बशीर बद्र

डॉ. जतिन्दर परवाज़

उर्दू शायरी की दुनिया का एक रौशन सितारा बुझ गया। मोहब्बत, रिश्तों, तन्हाई और इंसानी जज़्बात को अपनी सादा लेकिन असरदार ज़बान में बयान करने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 28 मई 2026 को भोपाल में उन्होंने आख़िरी सांस ली। वह लंबे समय से डिमेंशिया की बीमारी से जूझ रहे थे। बीमारी ने उनकी याददाश्त को धीरे-धीरे कमज़ोर कर दिया था, लेकिन उनकी शायरी आज भी करोड़ों लोगों की यादों में उसी तरह ज़िंदा है जैसे पहली बार सुनी गई हो।

डॉ. बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में थे जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल को सिर्फ अदबी महफ़िलों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आम आदमी की ज़िंदगी का हिस्सा बना दिया। उनके शेर किताबों से निकलकर लोगों की बातचीत, महफ़िलों, मुशायरों और सोशल मीडिया तक में सांस लेते रहे। उन्होंने कठिन लफ़्ज़ों के बजाय दिल की ज़बान चुनी और यही वजह है कि उनकी शायरी हर तबके के लोगों तक पहुँची।

15 फ़रवरी 1935 को उत्तर प्रदेश में जन्मे बशीर बद्र बाद में भोपाल आकर बस गए। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अध्यापन और साहित्य—दोनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई। उर्दू अदब में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सहित अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनके चाहने वाले थे, जिन्होंने उनके शेरों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लिया।

बशीर बद्र साहब से मेरी मुलाक़ात का सिलसिला भी मेरी ज़िंदगी की बड़ी पूँजी है। मुझे सबसे ज़्यादा उनके ही शेर याद हैं। अगर मैं यह कहूँ कि मैंने बशीर बद्र की शायरी पढ़कर ही ग़ज़ल लिखना सीखा, तो यह गलत नहीं होगा।

सन् 2009 में भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में मुझे ग़ज़ल लेखन में नौजवान शायरों में प्रथम पुरस्कार मिला था। कार्यक्रम में जाने से पहले मैंने उन्हें फ़ोन किया कि मैं भोपाल आ रहा हूँ। उन दिनों वह मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के चेयरमैन थे। समारोह के बाद उन्होंने मुझे अपने घर बुला लिया। मुझे तीन दिन उनके साथ रहने का अवसर मिला। उन दिनों वह पूरी तरह स्वस्थ थे।

लेकिन आज एक बात बार-बार याद आती है। बातचीत के दौरान उन्होंने अचानक मुझसे पूछा—“परवाज़, यह कौन-सा शहर है?”

मैंने कहा—“भोपाल।”

वह मुस्कुराकर बोले—“खुदा की कसम, मैं समझ रहा था मेरठ है।”
आज जब उस बात को याद करता हूँ तो लगता है कि शायद उनकी बीमारी की शुरुआत वहीं से हो चुकी थी।

उन तीन दिनों में मैंने सिर्फ एक बड़े शायर को नहीं, बल्कि एक बेहद सादा, मोहब्बत करने वाले और नए लिखने वालों की हौसला-अफ़ज़ाई करने वाले इंसान को करीब से देखा। चाय की महफ़िलें, शायरी की बातें और ग़ज़ल की बारीकियों पर लंबी चर्चाएँ आज भी मेरी यादों में ताज़ा हैं। वह बताते थे कि शायरी में सिर्फ अच्छे अल्फ़ाज़ काफी नहीं होते, एहसास की सच्चाई सबसे ज़रूरी होती है। वे मुझे अपनी कार में उर्दू अकादमी भी लेकर गए और एक मुशायरे में शिरकत का मौक़ा भी दिया।

वापिस कार में लौटते हुए उन्होंने मुझसे कहा—“शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने अपने उर्दू रिसाले ‘शबख़ून’ में मेरी ग़ज़ल कभी प्रकाशित नहीं की। वो क्या समझता है, अगर बशीर बद्र उनके रिसाले में नहीं छपेगा तो क्या शायर नहीं बन पाएगा!”शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी एक बहुत बड़े उर्दू आलोचक थे। उनकी बात में शिकायत कम और अपने हुनर पर भरोसा ज़्यादा था। सच तो यह है कि बशीर बद्र किसी एक रिसाले, आलोचक या मंच के मोहताज कभी नहीं रहे। उन्होंने अपने शेरों से सीधे लोगों के दिलों में जगह बनाई।

बाद में उन्होंने मेरी शायरी पर अपनी राय लिखकर भेजी। जब मेरी पहली उर्दू किताब ‘माज़ी के ज़ख़्म’ प्रकाशित हुई, तो मैंने उसे उस किताब में सम्मान के साथ शामिल किया। यह मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था।

फिर वक्त बदला। डिमेंशिया की बीमारी ने उन्हें धीरे-धीरे ख़ामोश कर दिया। लेकिन उनकी आँखों में अब भी शायरी की चमक कहीं न कहीं बाकी थी। जब भी मैं भोपाल जाता, उनसे और उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र साहिबा से ज़रूर मिलता। हर साल उनके जन्मदिन पर फ़ोन कर मुबारकबाद देना मेरी आदत बन गई थी।

करीब तीन-चार साल पहले मैं उनसे मिलने उनके घर गया। मैंने उनके ही कुछ मशहूर शेर उन्हें सुनाने शुरू किए। वह कुछ मिसरे मेरे साथ दोहराने लगे। जब डॉ. राहत बद्र ने उनसे कहा—“परवाज़ साहिब आपके शेर सुना रहे हैं”—तो उनके चेहरे पर बच्चों जैसी खुशी आ गई। वह दृश्य आज भी मेरी आँखों में बसा हुआ है। बीमारी उनकी याददाश्त को कम कर सकी, लेकिन शायरी उनके वजूद से आख़िरी दम तक अलग नहीं हुई।

बशीर बद्र का जाना सिर्फ एक शायर का जाना नहीं, बल्कि उर्दू ग़ज़ल के एक पूरे युग का ख़त्म हो जाना है। उन्होंने मोहब्बत को नई ज़बान दी, रिश्तों की टूटन को आवाज़ दी और इंसानी अकेलेपन को ऐसा बयान किया कि हर सुनने वाले को लगता था—ये शेर उसी की कहानी है।
उनके कई शेर आज भी लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा हैं—
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दोन जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भीकिसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक सेये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो 

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिलाअगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगाइतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने मेंतुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूँही आँखेंउदास होने का कोई सबब नहीं होता

अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता हैमैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखाकश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
ऐसे शायर सदियों में पैदा होते हैं। बशीर बद्र साहब इस दुनिया से रुख़्सत हो गए हैं, लेकिन उनकी शायरी आने वाली नस्लों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेगी।
ईद के दिन उनका इस दुनिया से जाना एक अजीब रूहानी एहसास  है।
“बिछड़ तो गया उसका चेहरा मगरहमेशा हमारी नज़र में रहा”

— डॉ. जतिन्दर परवाज़ उर्दू साहित्यकार हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी सेक्टर 14, पंचकूला – 134113

Mob 9868985658Email – jatinderparwaaz@gmail.com