Monday, 17 August 2026
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गिरफ्तारी को लेकर क्या हैं आपके अधिकार?

संजय मिश्रा

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को कई तरह के अधिकार मिले हुए हैं जैसे गिरफ्तारी का कारण जानने, 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने, मनपसंद वकील से सलाह लेने, परिवार या मित्र को सूचना पाने, और डॉक्टरी परीक्षण का अधिकार मिलता है।

धारा 47 और 36 के तहत पुलिस को गिरफ्तारी का पूरा कारण और विवरण तुरंत बताना होगा। अपनी पसंद के वकील से मिलने और कानूनी सलाह लेने का हक है। धारा 48 के तहत पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह आपके किसी रिश्तेदार या मित्र को तुरंत गिरफ्तारी की जगह और स्थिति की सूचना दे।जमानती अपराध होने पर जमानत के अधिकार के बारे में बताना पुलिस का कर्तव्य है। यात्रा के समय को छोड़कर, 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना अनिवार्य है। हिरासत के दौरान स्वास्थ्य और सुरक्षा सुरक्षित रखने के लिए मेडिकल जांच का भी प्रावधान है।

इसके पहले एक ऐतिहासिक केस डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 18 दिसंबर 1996 को पुलिस हिरासत में होने वाली हिंसा और मौतों को रोकने के लिए न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह और न्यायमूर्ति ए. एस. आनंद की खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल मामले में पुलिस हिरासत में होने वाली यातनाओं को रोकने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए निम्नलिखित 11 अनिवार्य दिशानिर्देश तय किए हैं :

स्पष्ट पहचान : गिरफ्तारी और पूछताछ करने वाले पुलिस अधिकारियों की वर्दी पर उनका स्पष्ट नाम और पदनाम होना चाहिए, जिससे उनकी पहचान साफ दिखे।

अरेस्ट मेमो (गिरफ्तारी ज्ञापन) : गिरफ्तारी के समय पुलिस को तुरंत एक मेमो तैयार करना होगा। इस पर कम से कम एक गवाह (परिवार का सदस्य या स्थानीय व्यक्ति) के हस्ताक्षर होने चाहिए।

परिजनों को सूचना : गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपने किसी परिवार के सदस्य, मित्र या शुभचिंतक को अपनी गिरफ्तारी और रखे जाने की जगह की जानकारी दे।

गिरफ्तारी की समय-सीमा की सूचना : यदि परिवार का कोई सदस्य बाहर रहता है, तो गिरफ्तारी के 8 से 12 घंटे के भीतर टेलीफोन या संदेश के जरिए उन्हें सूचना देनी होगी।

रजिस्टर में एंट्री : गिरफ्तारी की पूरी जानकारी पुलिस डायरी या थाने के रजिस्टर में दर्ज की जानी चाहिए।

मेडिकल जांच : गिरफ्तार व्यक्ति का हर 48 घंटे में हिरासत के दौरान डॉक्टर द्वारा मेडिकल परीक्षण कराया जाना अनिवार्य है।

स्वास्थ्य निरीक्षण : गिरफ्तारी के समय और हिरासत के पूरे समय में डॉक्टर द्वारा व्यक्ति की गंभीर या सामान्य चोटों की जांच रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए।

मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी : गिरफ्तार व्यक्ति को समय पर (24 घंटे के भीतर) मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना आवश्यक है।

वकील से मिलने का अधिकार : पूछताछ के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति को अपने वकील (वकील से परामर्श) से मिलने का हक होता है।

कंट्रोल रूम की स्थापना : सभी जिला और राज्य मुख्यालयों पर एक पुलिस नियंत्रण कक्ष (Control Room) बनाया जाना चाहिए, जहां गिरफ्तारी की जानकारी 12 घंटे के भीतर पहुंचाई जाए।

दस्तावेजीकरण : गिरफ्तारी से जुड़ी हर एक गतिविधि और जानकारी को रिकॉर्ड किया जाना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे

 अगर पुलिस डी. के. बसु केस के उप्ररोक दिशानिर्देशों (गिरफ्तारी और हिरासत के नियम) का पालन नहीं करती है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) एवं विभागीय कार्रवाई के उत्तरदायी होते हैं। पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार के पास निम्नलिखित कानूनी कदम उठाने का अधिकार है।

मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत : गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। यदि पुलिस नियमों का उल्लंघन करे, तो इसकी शिकायत तुरंत मजिस्ट्रेट से करें।

उच्च न्यायालय में याचिका : अवैध हिरासत या प्रताड़ना के खिलाफ उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर करें।

वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत : संबंधित जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SP/DCP) या मानवाधिकार आयोग (NHRC/SHRC) को लिखित शिकायत भेजें।