मनमोहन सिंह ‘दानिश’
तो हज़ूर हम आईपीएल के शेर हो गए हैं ढेर। कुछ क्रिकेट के विशेषज्ञ इसके लिए, टीम प्रबंधन को दोषी ठहरा रहे हैं, कुछ खिलाड़ियों पर तोहमत लगा रहे हैं, कुछ ने कप्तान की गलती ढूंढी। वैसे भी अपने देश की एक खासियत तो है, यहां हर आदमी और औरत डॉक्टर है, वकील है, और क्रिकेट विशेषज्ञ है। जिसने कभी गली क्रिकेट भी नहीं खेली वह भी क्रिकेट की बारीकियों पर इस तरह बात करता है जैसे वो सर डॉन ब्रेडमैन का रिश्तेदार हो।
खैर हम पिट गए। आयरलैंड में हमारा बुरा हाल हुआ। न उनकी गेंदबाजी समझ में आई न उनकी बैटिंग का पता चला। यहां आई पी एल में छक्कों पे छक्के लगाने वालों के शॉट्स ऐसे लगे कि हर गेंद अपने ही सर के ऊपर खड़ी होने लगी। अगर आप याद करेंगे तो पता चलेगा कि हमारे “छक्केबाजों” के अधिकतर कैच तीस मीटर के दायरे के अंदर ही पकड़े गए। अभिषेक शर्मा ने थोड़े बहुत रन बनाए लेकिन जब पूरी टीम मात्र 76 रन पर लुढ़क जाए तो किसे क्या कहें। 201 रन का पीछा करती टीम के पांच बल्लेबाज पाॅवर प्ले में निपट गए।
किसी माई के लाल ने न तो पिच को समझा, न अपना स्ट्रोक ही बदला। बस क्रॉस बैट से स्क्वायर ऑफ थे विकेट शॉट लगाने की कोशिश करते रहे। मुझे नहीं याद किसी भाई ने सही क्रिकेटिंग शॉट खेला हो। बाकी रही सही कसर कप्तानी ने पूरी करदी। बैटिंग ऑर्डर का तो जो तमाशा हुआ वह तो कम से कम मेरी समझ तो आया नहीं। टीम में अर्शदीप सिंह गेंद कर रहे हैं टेलेंडर बल्ले बाज आड़े ताड़े बल्ले घुमा रहे हैं, गेंद हवा में जा रही है, पर वहां फील्डर नहीं है। शॉर्ट थर्डमैन रखा है, कैच उसके सर के ऊपर से चार रन के लिए निकल रहा है। कोई स्लिप नहीं है। थर्ड मैन सीमा रेखा पर डीप रक्खा होता तो वो सभी कैच पकड़े जाते जो चार रन के लिए गए।
जो शॉट हमारे बल्लेबाज लगा रहे थे वे पिच के उछाल को बिना भांपे लग रहे थे। भारतीय पिचों पर जो उछाल होता है उससे कम से कम छह से आठ इंच ऊंचा उछाल इंग्लैंड की पिचों पर मिलता है, पर हमें तो अपने स्ट्रोक उसी अंदाज़ से लगाने थे जैसे हम भारत की पिचों पर लगाते हैं। अब यहां गेंद पूरे बल्ले पर न आकर उसके कोने पर लग जाती है, या थोड़ा और उछली तो बैट के हैंडल या दस्तानों पे लगती है। तो भाई छक्के कैसे लगें गे।
मैं तो यह सोच रहा हूं कि अगर टीम ने 76 रन ही बनाने थे तो इन खिलाड़ियों को भेजने की क्या ज़रूरत थी इतना सा काम तो हम कलमकार ही कर लेते। बस आउट ही होना था ना तो हम हो लेते। अगर हमें नहीं भेजना था तो कुछ बड़े नेताओं को भेज देते, वो वैसे भी तो बहुत ” लंबी लंबी ” फैंकते रहते हैं। अब स्थिति यह है कि हम बड़ी शान से एक सीरीज़ आयर लैंड में हार चुके हैं। दूसरी इंग्लैंड में अब जीत तो नहीं सकते क्योंकि दो मैच बचे हैं। बहुत हुआ तो सीरीज़ बराबर हो सकती है। वो तो भला हो इंद्र देवता का कि उनकी कृपा से पहला मैच धुल गया नहीं तो हालत तो वहां भी काफी पतली थी। यहां मुझे श्रेष अय्यर की कप्तानी का रिकॉर्ड बताना है। आईपीएल में वे किंग्स इलेवन पंजाब के कप्तान थे। उनकी कप्तानी में पंजाब ने सात मैच हरे। अब वे भारत के कप्तान हैं यहां भी चार मैच हार चुके हैं और एक बारिश ने बचा लिया।
खैर, थोड़े समय में हम सभी इस हार के ग़म को भूल जाएंगे और थोड़े शोर शराबे के बाद सब शांत हो जाएगा क्योंकि हमारे लिए मौजूदा क्रिकेट एक खेल नहीं केवल मनोरंजन का साधन है। तभी तो ये खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट से दूर भागते हैं।s
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