Saturday, 31 October 2026
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कुमारहट्टी का दुःखद हादसा और अवारा पशु

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

कल सवेरे दिन की शुरुआत होते ही कुमारहट्टी में एक अत्यंत दुःखद घटना घटी, जब एक आवरा बैल ने वहां के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति देवेंद्र वोहरा की जान लेली। वे अपने घर के बाहर झाड़ू लगा रहे थे। उनका का बेटा जब बचाने आया तो बैल ने उसे भी गम्भीर रूप से घायल कर दिया। ये आवरा पशु सालों से हम सभी के लिए बहुत बड़ा खतरा बने हुए हैं लेकिन हमारे यहां तब तक किसी चीज़ को गम्भीरता से नहीं लिया जाता जब तक कोई बहुत बड़ी घटना न हो जाए।

देवेंद्र वोहरा की इस अत्यंत दुःखद मौत से शायद प्रशासन की नींद खुल जाए। अवारा पशु, कुत्तों के झुंड और बंदर हमेशा से इंसानी जान के लिए खतरा बने रहे हैं लेकिन इनके प्रति पंचायतों, विभिन्न सरकारी विभागों और अधिकारियों का रवैया हमेशा ही उदासीन रहा है। अगर बाज़ार में कहीं अवारा पशु अपनी तरफ आता दिखे तो हम रास्ता बदल लेते हैं, सुबह की सैर को जाने वाले आत्मरक्षा के लिए कोई लाठी या डंडा हाथ में ले लेते हैं, बंदरों से बचाव के लिए घरों के खड़की दरवाजों पर सरिये या जाली लगवा लेते हैं।

मतलब यह कि हम रक्षात्मक तरीके ढूंढते रहते हैं। बहुत सी खबरें आती हैं कि कुत्तों के झुंड ने किसी छोटे से बच्चे को मार डाला, या बंदरों ने किसी आदमी या औरत पर हमला करके उससे खाने का सामान छीन लिया। दो चार दिन इस पर हो हल्ला होता है और फिर सभी कुछ सामान्य हो जाता है। कुछ समय पहले धर्मपुर में एक महिला जो छत्त से कपड़े उठाने गई थी, उस पर बंदरों ने हमला कर दिया और वह बेचारी खुद को बचाती हुए छत्त से गिर गई जिससे उसकी मौत हो गई। इसी तरह घर से बाहर खाट पर लेटी एक महिला पर बंदरों का झुंड टूट पड़ा और उसे कई जगह पर काट के ज़ख्मी कर दिया। पर प्रशासन लंबी तान कर सोता रहा।

कुमारहट्टी की घटना के बाद तो हर गांव, बस्ती और शहर में आवरा पशुओं, कुत्तों और बंदरों के खिलाफ पूरी मुहिम चलाने की ज़रूरत है। आखिर कब तक आम आदमी, औरत और बच्चा खौफ के साए में जिएगा?

इसके अलावा कुमारहट्टी का फ्लाईओवर मौत को दावत है। आपकी किस्मत अच्छी है तो आप वहां से सुरक्षित निकल सकते हैं वरना कोई भरोसा नहीं। पूरा प्रशासन, हिमाचल सरकार, शिमला, सोलन, कसौली की अदालतों के न्यायाधीश सभी इस फ्लाईओवर से अपनी जान जोखिम में डाल कर गुज़रते हैं पर कोई कार्रवाई आज तो की नहीं। असली बात यह है कि हमारी मौजूदा संस्कृति में इंसानी जीवन की कोई कीमत नहीं। प्रवचन और भाषणों तक सीमित है हमारे नेताओं की चिंताएं।
मेरे विचार में “चिट्टे” के साथ साथ हमें आवरा पशुओं, कुत्तों और बंदरों की खिलाफ भी इक बड़ी मुहिम चलाने की ज़रूरत है।

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