Friday, 17 April 2026
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डॉक्टर इंजीनियर बनाने के लिए दिन में 12 से 14 घंटो तक काम किया आज पूछते है आपने हमारे लिए किया क्या

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मीडिया के सामने झलका माता पिता का दर्द

आर के शर्मा/चंडीगढ़

मेरा एक बच्चा इंजीनियर है और एक बेटा डॉक्टर लेकिन आज अपने माँ बाप के लिए किसी के पास टाइम नहीं है। उनकी अच्छी पढ़ाई और परवरिश के लिए दिन में 12 से 14 घंटो तक काम किया। आज पूछते है कि आपने हमारे लिए किया क्या है। कुछ इस तरह दुःखी ह्रदय से पीड़ित माता पिता भलाई मंच के अध्यक्ष सतीश कुमार ने आप बीती बताई।

(MOREPIC1) (SUBHEAD)सेक्टर 27 स्तिथ प्रेस क्लब में पीड़ित माता पिता भलाई मंच द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में सतीश कुमार ने अपना निजी अनुभव सांझा करते हुए कहा कि वृद्धाश्रमों में भीड़ बढ़ती जा रही है। बुजुर्गो के दुखड़े सुनने बैठ जाओ तो आँखो से आंसू झलक पड़ते है।

संतानें उनसे जमीनें, मकान, दुकानें अपने नाम लिखाकर उन्हें वृद्धाश्रमों में छोड़ जाती है । आज बुजुर्गों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है ।

सतीश बताते है कि बच्चे मां-बाप की आरजू हैं, जिंदगी का सहारा होते हैं, बुढ़ापे की लाठी होते हैं ,ऐसे में जब वह बुजर्गो को अपने से अलग करते है। उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आते है। ऐसे में बुजर्गो की जीने की इच्छा समाप्त हो जाती है। सिर्फ शरीर जिंदा रहता है आत्मा मर चुकी होती है। जो जिगर का टुकड़ा होता है वही तड़पने के लिए छोड़ देता है।

ऐसी संतान के लिए दिल से कभी आशीर्वाद नहीं निकलता। जीवन के अंतिम चरण में अपनी औलादों की बेरुखी का शिकार और ठुकरा दिए जाने के बाद वृद्धआश्रम ही एक बड़ा सहारा बना है। सतीश ने कहा कि जिसकी उंगलियों को पकड़कर बचपन में चलना सीखा, आज उन्हीं माँ बाप को बच्चे अनजान सफर पर छोड़ देते है । हाल-चाल, सेहत की फिक्र तो दूर बच्चों ने तो सालो से उनकी सूरत तक नहीं देखी। इन बुजुर्गों को आखिरी पड़ाव पर जब सहारे की जरूरत थी, बच्चों ने उनका साथ छोड़ दिया।