Saturday, 01 August 2026
Breaking News
ठहरे चरण, बहती करुणा: चातुर्मास का गूढ़ दर्शन और सूक्ष्म अहिंसा श्री नयना देवी धाम पर बरनाला के धार्मिक संगठन को मिली मेडिकल शिविर लगाने की अनुमति एडवोकेट रोहित जोशी लोजपा (रामविलास), चण्डीगढ़ के लीगल सेल के जिला अध्यक्ष नियुक्त मुख्यमंत्री ने ‘जाखू मन्दिर-संजीवनी बूटी का रहस्य’ पुस्तक का किया विमोचन गुरु पूर्णिमा पर किन्नर समाज ने साईं बाबा को सोने का छत्र किया अर्पित हरियाणा के खेल मंत्री गौरव गौतम गुरु रविदास नॉर्थ ज़ोन गर्ल्स वॉलीबॉल ट्रॉफी का करेंगे अनावरण पंजाब को इंग्लैंड, फिनलैंड, न्यूजीलैंड आइसलैंड बनाने की जगह आप सरकार ने बना दिया धरना-लैंड, नशा-लैंड, गैंगस्टर-लैंडः ढिल्लों  गुरु रविदास ट्रॉफी: पहला नॉर्थ जोन गर्ल्स वॉलीबॉल कैश प्राइज टूर्नामेंट 18 अगस्त से पंचकूला में संगरूर में भाजपा कार्यालय पर पेट्रोल बम से हमला गौ हत्या बंद कराने और गौ माता को राष्ट्र माता घोषित कराने एडीसी को दिया ज्ञापन
राष्ट्रीय Trending

बशीर बद्र की ग़ज़लों की हिंदी में पहली किताब अबोहर में हुई थी प्रकाशित

राज सदोष

मशहूर उर्दू शायर और ग़ज़लकार बशीर बद्र का बकरीद के मौके पर गुरुवार को भोपाल में 91 साल की उम्र में निधन हो गया। अपनी शायरी पढ़ने के खास अंदाज़ और सदाबहार शायरी के लिए मशहूर, उन्हें पूरे देश में लाखों चाहने वालों का प्यार मिला।

खास बात यह है कि बशीर बद्र की ग़ज़लों की हिंदी में पहली किताब शब्दलोक प्रकाशन, अबोहर से प्रकाशित हुई थी, जिसे मशहूर हिंदी और उर्दू लेखक मोहन लाल चलाते थे। बद्र तीन बार अबोहर आए थे और चुनिंदा महफिलों में अपनी शायरी सुनाकर सैकड़ों लोगों का दिल जीता था।

श्री गंगानगर में भी वे अपने चाहने वालों के बीच सबसे पसंदीदा शायरों में से एक थे। बशीर बद्र ने भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने घर पर दोपहर करीब 12 बजे आखिरी सांस ली। वे लंबे समय से डिमेंशिया और बढ़ती उम्र से जुड़ी दूसरी बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके निधन से भारत और विदेशों में साहित्य प्रेमियों, कलाकारों और उनके चाहने वालों के बीच शोक की लहर दौड़ गई है। 15 फरवरी, 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे बद्र ने अपनी उच्च शिक्षा और पीएचडी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पूरी की थी। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर काम किया और बाद में 17 साल तक मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के प्रमुख के तौर पर अपनी सेवाएं दीं।

उन्हें पद्म श्री (1999), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1999), उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार (चार बार) और बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

उन्होंने 18,000 से ज़्यादा शेर, उर्दू ग़ज़लों के 7 संग्रह, हिंदी कविताओं के संग्रह, 2 आत्मकथाएं और देवनागरी, गुजराती और विदेशी भाषाओं में प्रकाशित कई किताबें लिखीं।

डॉ. बशीर बद्र को आधुनिक उर्दू ग़ज़लों में उनके योगदान के लिए बहुत सम्मान मिला और वे भारतीय साहित्य की सबसे पसंदीदा आवाज़ों में से एक बने रहे।

बशीर बद्र के शेर :

‘हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।

‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है, जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है.  (लेखक जाने माने वरिष्ठ पत्रकार हैं)