Sunday, 18 October 2026
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श्रद्धांजलि : यादों में ज़िंदा एक प्रोफेसर

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

” सर नहीं रहे”, पांवटा साहिब से राजेश के ये शब्द फोन पर सुन कर मैं जैसे जड़ हो गया था। बात है 17 अगस्त 2013 की। इसके साथ ही मेरे मानस पटल पर उनके सानिध्य में गुज़रे सभी पल एक फिल्म की तार आने लगे।

एक शिक्षक, एक दोस्त, एक मार्गदर्शक, संतोष कुमार सर ऐसे ही थे। क्लास में एक कठोर शिक्षक, क्लास से बाहर खुल के हंसने वाले दोस्त और जब भी किसी छात्र को ज़रूरत हुई तो उसके मार्ग दर्शक। कमाल का व्यक्तित्व था उनका। ग़लत को ग़लत कहने का हौसला था उनमें। अनुशासन और वक्त के बहुत पाबंद थे। उनसे यही सीखा। आज उनको हम सब से बिछुड़े हुए 13 साल हो गए लेकिन आज भी वे हमारे दिलों में ज़िंदा हैं। उनकी आवाज़ कानों में गूंजती है।

संतोष सर जिन्हें हम सभी लोग प्यार से “भाई जी” भी बुलाते थे, बहुआयामी शख्शियत के मालिक थे। जब वे क्लास में अंग्रेज़ी पढ़ाते तो लगता जैसे खुद शेक्सपियर सामने खड़ा है, जब हमे बैडमिंटन की कोचिंग देते तो लगता था कोई इंडोनेशियाई या चीनी कोच हमसे रूबरू है। बैडमिंटन की जो टेक्नीक्स उन्होंने प्रोफेसर एस के गुप्ता के साथ मिल कर हमें सीखने की कोशिश की, जाहिर है हमने सीखी नहीं, वे सभी कुछ सालों बाद मैने चीनी खिलाड़ियों को अपनाते देखा। गुप्ता जी फिजिक्स के प्रोफेसर थे और शतरंज के बहुत बड़े खिलाड़ी। बहुत कम लोग जानते हैं कि संतोष सर ने अपनी शुरुआत हिंदी के प्रोफेसर के तौर पर की थी, मुझे खुद उनके देहांत के बाद यह बात पता चली। असल में उन्होंने हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में एम ए किया था।

एक ड्रामा निर्देशक के तौर पर उनका एक अलग ही किरदार सामने आता है। मैने उन्हें मोहन राकेश का कालजेई नाटक “आषाढ़ का एक दिन” निर्देशित करते देख है। वे संवादों के उच्चारण का खास ध्यान रखते थे। कोई भी गलत उच्चारण उनको बिल्कुल सहन नहीं होता था। उनका गुस्सा अति भयानक होता। उस हंसमुख चेहरे के पीछे इतने गुस्से वाला व्यक्ति भी हो सकता है इसकी कल्पना भी नहीं होती थी। कई बार वे हाथ भी उठा देते थे। नाटक की रिहर्सल में अगर उनको गुस्सा आता तो हाथ में जो कुछ भी होता वही कलाकार पर फेंक के मारते। उनके व्यक्तित्व को समझना हर एक के बस की बात नहीं थी। उसे वही समझ पाया जो उनके बहुत निकट हुआ।

आत्मसम्मान और उसूल उनके लिए सर्वोपरि थे। इन दोनों चीजों के लिए उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। वैसे तो उन पर पूरी किताब लिखी जा सकती है, पर यहां मैं एक छोटी सी घटना का ज़िक्र ज़रूर करूंगा। सन तो याद नहीं लेकिन इतना याद है कि हम लोग कॉलेज छोड़ चुके थे। और संतोष सर भी शायद नहान कॉलेज में थे। एक दिन उनका संदेश आया कि मैं सोलन के रेस्ट हाऊस में आ रहा हूं मुझसे आ कर मिलो। मैं और मेरा दोस्त अश्वनी लाल हम दोनों तय समय पर उनसे मिलने रेस्ट हाऊस चले गए। वहां उनका बर्ताव कुछ बदला हुआ था। उनकी बातचीत में काफी रूखापन था। यहां तक कि उन्हों ने हमें बैठने को भी नहीं कहा। बस इतना बोले, ” मैं यहां कॉलेज में होने वाली परीक्षाओं के लिए सुपरिंटेंडेंट बन कर आया हूं और जब तक परीक्षाएं चलेंगी आप सब लोग मुझसे मिलने की कोशिश भी मत करना।” और उस दौरान वे किसी से नहीं मिले। परीक्षा खत्म होने के बाद वे एक दिन और रुके हमें बुलाया, हमारे कुछ और सहपाठी भी साथ थे, हम सभी को लंच करवाया, खूब हंसी ठिठोली हुई। इस तरह स्वभाव था उनका।

उनके जीवन के आखिरी दिनों में मैं उनसे मिलने अक्सर पांवटा साहिब चला जाता। खूब बातें होती। वे मुझे हंसते हंसते विदा करते। लेकिन जब मैं उनसे आखिरी बार मिला और वापिस आने के लिए कार में बैठ रहा था तो पहली बार उनके चेहरे पर उदासी थी। मेरी खिड़की के पास आ कर बोले, “यार मिलते रहा करो अच्छा लगता है” । मै हल्का सा मुस्कुराया और कहा, सर बिल्कुल मिलता रहूंगा। इतना कह कर मैं चला आया। ऐसी बात उन्होंने पहले कभी नहीं की थी। मुझे क्या पता था कि अब उनसे कभी नहीं मिलूंगा। फिर एक दिन उनके एक छात्र राजेश का फोन आया। उसने बस इतना कहा, ” सर नहीं रहे”। मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं था। कुछ देर मै स्तब्ध खड़ा रहा और फिर मैने बिना कुछ कहे फोन काट दिया। कुछ समय बाद राजेश को फोन करके मैंने बाकी जानकारी हासिल की, बाकी दोस्तों को सूचना दी। मुझे इस बात की तसल्ली है कि मैं उनके अंतिम संस्कार में शामिल हो पाया। उनके आखिरी दर्शन किए। संतोष सर चले गए पर हमें बहुत कुछ देने के बाद। वे सदा हमारे दिल में ज़िंदा रहेंगे।

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