मनमोहन सिंह ‘दानिश’
साहब क्या बात है। आजकल एक गीत पता नहीं किसने लिखा, किसने गाया, किसने संगीत दिया, किसकी समझ में आया, या नहीं आया, पर उसे कॉर्पोरेट से लेकर स्कूल सभी झूम झूम कर गा रहे हैं। एक स्कूल का वीडियो मैं देख रहा था, जाहिर है सोशल मीडिया पर था। उसमें तीन चार महिला टीचर्स पूरी तरह से एक्शन के साथ इस गाने पर झूम रही थीं। सामने मैदान में बैठे बच्चे बाहें हिला हिला कर इस गाने का आनंद ले रहे थे।
मैने गाने को बड़े ध्यान से सुना। और समझने की कोशिश की। पर मेरी अल्प बुद्धि उसे समझने में नाकाम रही। तो सोचा अपने कुछ विद्वान दोस्तों से समझने कीकोशिश करता हूं। मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था, इसका यह अर्थ नहीं है कि मेरे दोस्त, मित्र, और चाहने वाले भी मेरे जैसे ही हैं। तो जनाब जिस गाने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मंच सजते हैं उसका मुखड़ा कुछ इस तरह से हैं:
” हम वक्त बदलेंगे जज्बात बदल देंगे
जो बुरी लगी दिल को हर बात बदल देंगे”तो हजूर इस मुखड़े के पहले मिसरे का पहला हिस्सा समझ में आता है कि शायर का दावा है कि वह वक्त बदल सकता है या बदल सकते हैं पर अगले हिस्से में कहा है “जज्बात” बदल देंगे। समझ में नहीं आया किसके जज़्बात बदलने की बात है? पहले तो मेरे ख्याल में शब्द “जज़्बात” है “जज्बात” नहीं। दूसरे, जज़्बात तो बेहद निजी मामला है उसे कोई कैसे बदल सकता है। और अगली लाइन तो और भी कमाल की है, शायर कहता है, ” जो बुरी लगी दिल को हर बात बदल देंगे”। आप किसी बात को अनदेखा कर सकते हो, भूल सकते हो, जो बात हो गई उसे बदलोगे कैसे? वो तो हो गई।
खैर अब बात इसके अंतरे की कर लेते हैं। इसके शब्द हैं:
” मंजूर नहीं थकना, मंजूर नहीं रुकना”, सही है। पर अगली लाइन में तो तबाही है। कहते हैं, ” मंजूर नहीं हमको हालातों से लड़ना”। वैसे तो मेरे हिसाब से “हालात” अपने आप में बहुवचन है। उसे “हालातों” लिखना या कहना ही गलत है पर यहां लेखक हालात के साथ लड़ना भी नहीं चाह रहा। लेकिन अगली पंक्ति में कहता है, “दिन रात पसीने से हालात बदलेंगे”। अरे भाई साहब जब हालात से लड़ना ही नहीं है तो पसीना किसके लिए और हालात कैसे बदलोगे?
अब अगले बंद पर आ जाते हैं। कहा है,” हम आए हैं जग में कुछ दे कर जाएंगे,
सब को नतमस्तक कर वर लेकर जाएंगे”या तो मैने ये मिसरे ठीक से नहीं सुने या फिर समझा नहीं। दूसरों को नतमस्तक करके यानी झुका के वर कैसे मिलेगा? कोई दादागिरी है क्या?
आगे एक शब्द है “ठोकरदाता”। अब पता नहीं इस शब्द का अर्थ क्या है? सही है मैने यह कभी पढ़ा नहीं। खैर कहा हैं, ” ठोकरदाताओं की औकात बदलेंगे”। औकात बदली नहीं जाती दिखाई जाती है। किसी की औकात कोई कैसे बदल सकता है।अब इसका मकता या अंत तो और भी कमाल का है। तीन मिसरे हैं और तीनों का आपस में कोई रिश्ता नहीं। मिसरे हैं:
” कुछ लोग यहां आ कर बस खा कर जाते हैं
कुछ लोग यहां रोकर कुछ पा कर जाते हैं
हम कर्मवीर बालक कायनात बदलेंगे”अब इन तीनों मिसरों की रब्त क्या है मेरी समझ से बाहर है। आपको समझ में कुछ आए तो मुझे भी समझा देना।
जहां तक धुन की बात है तो उसके लिए न जाने क्यों मुझे1992 में आई धर्मेंद्र की फिल्म “तहलका” का गाना:” दिल दीवाने का डोला दिलदार के लिए
मैने रंगा बसंती चोला मेरे यार के लिएजो बीत गया वो अब दौर न आयेगा
इस दिल में सिवा तेरे कोई और न आयेगाखैर गीत खूब चल रहा है। आप भी मजे लो। मुझे तो समझ में नहीं आया इसलिए पूछ लिया। आखिर दोस्तों को भी तो कुछ काम देते रहना चाहिए।
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