Monday, 07 September 2026
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धर्म में भाव और विवेक सर्वोपरि – क्षुल्लक प्रज्ञांश सागर 

-समीर जैन

परम श्रद्धेय क्षुल्लक श्री 105 प्रज्ञांश सागर जी महाराज का श्री शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर, रानी बाग, दिल्ली में मंगल प्रवेश पर समस्त समाज द्वारा भावपूर्ण स्वागत किया गया।

इस अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए क्षुल्लक श्री ने कहा कि जैन दर्शन मूलतः भाव प्रधान दर्शन है। यद्यपि धार्मिक क्रियाओं का अपना महत्व है, किन्तु केवल बाह्य क्रियाओं तक सीमित रह जाना उचित नहीं है। प्रत्येक धार्मिक कार्य विवेक, श्रद्धा एवं शुद्ध भावों के साथ किया जाए, तभी वह वास्तविक रूप से फलदायी बनता है।

उन्होंने कहा कि यदि अनेक पूजाएँ करने के बाद भी मन में संक्लेश, अशांति या अहंकार उत्पन्न हो रहा है, तो ऐसी साधना का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता। व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य एवं अनुकूलता के अनुसार ही धर्माचरण करना चाहिए, जिससे मन में शांति एवं आत्मिक संतोष का अनुभव हो।

क्षुल्लक श्री ने वर्तमान पीढ़ी के संदर्भ में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के युवा मन्दिरों से इसलिए दूर होते जा रहे हैं क्योंकि वे देखते हैं कि मन्दिर से लौटने के बाद भी परिवार के बड़े-बुजुर्ग आपसी विवाद एवं कलह में उलझे रहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि मन्दिर जाकर भी जीवन में विनम्रता, सौम्यता और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन नहीं आता, तो ऐसी आराधना का वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं हो सकता।