Tuesday, 06 October 2026
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कामरेड जगदीश भारद्वाज का जाना एक युग का अंत

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

आज सवेरे पांच बजे जैसे मैं अपने पुस्तकालय में कुछ लिखने के लिए बैठा वैसे ही कामरेड जगदीश भारद्वाज के आकस्मिक निधन का दुःखद समाचार सोशल मीडिया पर पढ़ा। मुझे विश्वास नहीं हुआ। पर जब दो तीन जगह इस खबर को देख तो स्तब्ध रह गया।

कामरेड जगदीश भारद्वाज से मेरा परिचय सालों पुराना था। मैने उन्हें उनकी युवा अवस्था से मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ते देखा। फिर वो चाहे परवाणू के कारखानों के मज़दूर थे या फिर, बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़ के मज़दूर। अगर ये कहूँ कि पूरे हिमाचल के मजदूरों को उन्होंने संगठित किया तो गलत नहीं होगा। अपने अंतिम समय तक वे ट्रेड यूनियन के अग्रणी ध्वज वाहक रहे।

आज के समय में जब सरकार की तरफ से मजदूरों के अधिकारों पर हमले हो रहे हैं और मौजूदा व्यवस्था मेहनतकश लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी कुठाराघात कर रही है, कामरेड भारद्वाज की सबसे अधिक ज़रूरत थी। ऐसे समय में उनका जाना मजदूर वर्ग के संघर्ष के लिए घातक है । उनके जाने से ट्रेड यूनियन आंदोलन को अपूर्णीय क्षति पहुंची है। कामरेड जगदीश भारद्वाज ने जीवन में कभी हार नहीं मानी। लगातार लड़ते रहे। किसी परिस्थिति से घबराए नहीं। ऐसे जुझारू नेता को लाला सलाम। उनके लिए बस इतना ही कहूंगा:

“दिल में हो जिनके हौसला ऊंची उड़ान का
कब देखते हैं कद वो भला आसमान का”

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