Wednesday, 09 September 2026
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ज्वालामुखी में काल भैरव अष्टमी धर्मिक श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाई गई

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विजयेन्दर शर्मा/ज्वालामुखी 

काल भैरव अष्टमी बुधवार को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला के ज्वालामुखी में धर्मिक श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाई गई। बड़ी तादाद में श्रद्धालु यहां बाबा भैरव के मंदिर में सुबह से ही दशनों को आने शुरू हो गये थे। जिससे महौल भक्तिमय बना हुआ है।

(MOREPIC1)(MOREPIC2)    सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ ज्वालामुखी से सटी कालीधार के आंचल में स्थित हजारों साल पुराने इस मंदिर का अपना एक महत्व है। यहां आज भी भक्त भैरव को प्रसन्न करने व अपनी मन्नौती पूरी होने पर मदिरा से भैरव का अभिषेक करते हैं। इस जंगल में आज के दिन जब लोग यहां जुटते हैं तो यहां जगल में मंगल वाली कहावत सिद्ध होती है। घने जंगल में भक्तों की मौजूदगी से रौनक देखते ही बनती है।

ऐसा माना जाता है कि सती के अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे तो शक्तिपीठ बने वहीं भगवान शंकर वहां वहां भैरव रूप में अवतरित हुये। ज्वालामुखी में उन्मत्त भैरव रूप में स्थापित हैं। ऐसा माना जाता है कि मार्गशीर्ष कृष्ष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को भगवान भोले नाथ भैरव रूप में प्रकट हुए थे। हजारों साल पुरानी इस प्रस्तर प्रतिमा पर श्रद्धालु नतमस्तक हो अपनी मनौतियां मांगते हैं। यहां प्रसाद के रूप में बाकायदा मदिरा भी चढ़ाई जाती है। पहले पश्ु बलि का भी विधान था। लेकिनहिमाचल हाईकोर्ट के आदेशों के चलते इसे रोका गया है।

आयोजन समिति के सदस्य राहुल शर्मा ने बताया कि प्राचीन चली आ रही परंपरा के तहत ज्वालामुखी के लोगों की ओर से यहां भैरव जयंती के अवसर पर श्रद्धालुओं के लिये विशेष भंडारे की व्यवस्था पूरा दिन के लिये की गई । उन्होंने बताया कि श्रद्धालु यहां भैरव को खुश करने के लिए उनके भक्त अभिषेक कर रहे हैं। जिससे यहां भक्तिमय माहौल बना है। भैरव मंदिर के आसपास के सुनसान जंगल में भी आज अनोखा ही नजारा बना रहा।

आचार्य प्रबल शास्त्री ने बताया कि इस साल भी यहां पूरा दिन श्रद्धालुओं ने अपने अराध्य देव का पूजन किया,उन्होंने कहा कि भैरव को दंडाधिपति भी कहा जाता है। उनका वाहन कुत्ता है। उन्होंने बताया कि भगवान भैरव को खुश करने के लिये विशेषकर चमेली के तेल व खुशबुदार फूलों से अभिषेक किया जाता है। उनकी पूजा रात्रि काल में ही होती है। उन्होंने बताया कि भैरव अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाते हैं। शिव के इस भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों के सभी प्रकार के पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं. इनकी भक्ति मनोवांछित फल देने वाली कही गयी है।

मंदिर अधिकारी बचित्तर सिंह ने बताया कि श्रद्धालु यहां अपनी श्रद्धाभाव के चलते यहां मदिरा चढ़ाते हैं। हालांकि यहां पहले प्शु बलि भी होती थी। लेकिन हिमाचल हाईकोर्ट के आदेशों के बाद इस पर रोक लगाई गई है। ऐसी मान्यता है कि तंत्र पूजा में भैरव को इसका भोग लगता है। उन्होंने बताया कि मंदिर प्रशासन ने यहां विशेष इंतजाम किये थे।