Monday, 08 June 2026
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अध्यात्म का मूल है, मन की शांति, बेहतर निर्णयों के लिए मन का शांत होना आवश्यक: राज्यपाल

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फेस2न्यूज/चंडीगढ़/गुरुग्राम

हरियाणा के राज्यपाल श्री बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि अध्यात्म का मूल है, मन की शांति। जीवन में निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बेहतर निर्णय लेना आवश्यक है और बेहतर निर्णय केवल शांत मन से ही लिए जा सकते हैं। अध्यात्म हमें दूसरों के लिए समाज की भलाई के लिए जीवन जीना सिखाता है। आंतरिक शुद्धिकरण से ही बाहर का शुद्धिकरण हो सकता है इसलिए आध्यामित्कता के बिना जीवन मूल्यों की धारणा नहीं हो सकती है। राज्यपाल गुरुग्राम के भोड़ा कलाँ स्थित ओम शांति रिट्रीट सेंटर में ब्रह्मा विरासत उत्सव समारोह में बतौर मुख्यातिथि संबोधित कर रहे थे।

श्री दत्तात्रेय ने उपस्थित ओम शांति संस्थान के अनुयायियों को संबोधित करते हुए कहा कि विश्व एक परिवार है और हम सब एक ईश्वर की संतान होने के कारण आपस में भाई- भाई हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम” भारत के चिन्तन का आधार है।

(MOREPIC1)  (SUBHEAD)भारत ऐसा देश है जिसने गीता के माध्यम से सारे विश्व को संदेश दिया है कि ईश्वर को पाने के मार्ग अनेक हो सकते हैं लेकिन ईश्वर एक ही है। समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आध्यात्मिक क्रांति लाने की जरूरत है। भौतिकवाद और विभिन्न कारणों से देश व दुनिया में बढ़ रही हिंसा व अराजकता से हमारी शांति खण्डित हो रही है।  आध्यामित्कता से ही हम मन की शुद्धि कर सकते हैं। आध्यात्मिक शिक्षा से हम सभी समस्याओं का हल निकाल सकते हैं। व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से देश और देश से संसार बनता है। संसार में बदलाव लाना है तो व्यक्ति में परिवर्तन लाना पड़ेगा। सारा विश्व ही मेरा परिवार है। जब इस तरह की भावना मन में होती है तो हम दूसरों के दुख- दर्द को अपना मानने लगते हैं।

राज्यपाल ने  साधना पर बल देते हुए कहा कि साधना बहुत बड़ी चीज है जो सबको उपलब्ध नहीं है जीवन में सफलता के शिखर पर पहुंचने के लिए साधना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपनी दिनचर्या में साधना को शामिल कर आगे बढ़ेगा उसे निश्चित ही सफलता मिलेगी व वह संतुष्ट व्यक्ति बनेगा।

उन्होंने आंतरिक शुद्धिकरण पर अपने विचार रखते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में प्रेम होना चाहिए, दया का भाव होना चाहिए, उसके मन में सदैव समाज के लिए जीवन अर्पण करने का भाव होना चाहिए। शरीर की शुद्धि के साथ-साथ आत्मा की शुद्धि भी बेहद आवश्यक है उन्होंने कहा कि मनुष्य का आत्म शुद्धि के साथ-साथ भावशुद्धि पर भी ध्यान देना जरूरी है। इससे वह एक श्रेष्ठ और चरित्रवान नागरिक बन जाता है।

श्री दत्तात्रेय ने शंकराचार्य के श्लोक “सत्संगत्वे निस्संगत्वं निस्संगत्वे निर्मोहत्वम, निर्मोहत्वे निश्चलतत्वं निश्चलतत्वे जीवन्मुक्ति: का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्संग से निस्संगता पैदा होती है और निस्संगता से अमोह। अमोह से चित्त निश्चल होता है और निश्चल चित्त से जीवन मुक्ति उपलब्ध होती है।