Tuesday, 06 October 2026
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पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी प्राकृतिक उपचार की दिशा में एक नया कदम, दवाइयों एवं ऑपरेशन से मुक्ति : मीना कुमारी बांगड़

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फेस2न्यूज /पंचकूला :

पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी में मरीज के शरीर के द्वारा ही औषधि का निर्माण कराया जाता है तथा शरीर के विशिष्ट बिंदुओं को सक्रिय किया जाता है जिससे आंतरिक अंगों की कार्यप्रणाली सुधरती है और शरीर स्वयं को ठीक करने लगता है। ये कहना था न्यूरो थेरेपिस्ट एवं योग एक्सपर्ट मीना कुमारी बांगड़ का जिन्होंने पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी एवं वेलनेस सेंटर, रोहतक की पहली शाखा का पंचकूला में स्थापित की है।

(MOREPIC1)शाखा का उद्घाटन जेवेलर्स एसोसिएशन, चण्डीगढ़ के अध्यक्ष एवं दुखभंजन वेलफेयर एन्ड चैरिटेबल ट्रस्ट के वाईस चेयरमैन महेन्दर सिंह बरेटा, समाजसेवियों डॉ अमर नाथ गर्ग एवं डॉ एसएस काहलों ने किया। उनके मुताबिक जब हम केवल लक्षणों को दबाने के बजाय बीमारी की जड़ को समझकर इलाज करते हैं, तभी सच्चा उपचार होता है।

मीना कुमारी बांगड़ ने बताया कि उन्हें ये कला उनके गुरु लाजपतराय मेहरा ने सिखाई थी जिसके तहत बिना दवा, बिना ऑपरेशन और बिना किसी साइड इफेक्ट के शरीर की ऊर्जा को संतुलित कर विभिन्न रोगों का 100 फीसदी प्राकृतिक उपचार प्रदान किया जाता है।

उन्होंने खुलासा किया कि इस उपचार विधि के तहत शरीर की अन्तर्स्रावी ग्रंथियों को सक्रिय करके मीना कुमारी बांगड़ ने बताया कि उन्होंने लगभग 10 वर्ष पूर्व पुनर्जीवन न्यूरोथेरेपी एवं वेलनेस सेंटर स्थापित किया था और इस पारदर्शी, सस्ती व नैतिक उपचार प्रणाली के जरिए अब तक हजारों रोगी लाभ प्राप्त कर चुके हैं। रोगियों को इससे हो रहे फायदे को देखते हुए अब इस सेण्टर के विस्तार की योजना के तहत इसकी पहली शाखा पंचकूला में खोली गई है।

उन्होंने बताया कि सामान्य से लेकर गंभीर और न्यूरोलॉजिकल रोगों तक, वे अनेक रोगों का सफलतापूर्वक उपचार करती हैं जिनमें सामान्य रोगों जैसे लकवा, सेरेब्रल पाल्सी, माइग्रेन व सिरदर्द, साइटिका, सर्वाइकल व कमर दर्द, डायबिटीज, थायरॉयड, हाई बीपी गैस, कब्ज, एसिडिटी जैसी पाचन समस्याएं, जोड़ दर्द, हार्मोन असंतुलन, थकान व गंभीर एवं न्यूरोलॉजिकल विकारों ग्लूकोमा (काला मोतिया), भेंगापन, रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा, फेशियल पैरालिसिस, नर्व की कमजोरी मिर्गी तथा अन्य जटिल व दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल समस्याएं आदि शामिल हैं।

इलाज की अवधि के बारे में मीना कुमारी बांगड़ ने बताया कि प्रत्येक रोगी के अनुसार इलाज की अवधि अलग होती है, परंतु अधिकांश मामलों में 7 से 15 दिनों के भीतर सुधार दिखने लगता है। 

इस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान संस्था के अध्यक्ष अनूप सरीन, समाजसेविका शंकुतला रानी, वरिष्ठ पत्रकार केवल भर्ती एवं जितेंदर पाल सिंह आदि भी उपस्थित रहे।

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