दीपक सिंह/ चंडीगढ़
संस्कार भारती चंडीगढ़ एवं बृहस्पति कला केंद्र के संयुक्त संयोजन में साहित्य सरिता के 109वें संस्करण में कवि गोष्ठी का आयोजन स्थानीय प्राचीन कला केंद्र में किया गया। कार्यकम में 17 कवियों और शायरों ने अपनी अपनी प्रस्तुतियां दीं। कार्यकम का प्रारम्भ संस्कार भारती चंडीगढ़ के संरक्षक एवं बृहस्पति कला केंद्र के संस्थापक प्रो. सौभाग्य वर्धन की ओर से सभी रचनाकारों के स्वागत संबोधन से किया गया।
कार्यक्रम में प्रतिभा माही ने “पांव जख्मी थे तो भी मैं चलती रही, बात इतनी सी लोगों को खलती रही” सुनाकर तालियाँ बटोरी। उनके अलावा कुसुम धीमान ने पढ़ा “पहुँच गए प्रौढ़ावस्था में, सोच समझ पग धरना है, दे जाएँ जग को कुछ अच्छा, नेक कार्य नित करना है”, राजीव गुप्ता ने “कैसे हाले दिल हम सुनाएं तुम्हें, कैसे जख्में दिल हम दिखाएं तुम्हें”, गुलशन चमौली ने “तुम चारु चंद्र चंचल समान चंद्र लोक की चंद्रावली जैसी, तुम तारामंडल की आभा में बसी इंद्र लोक की इंद्रावली जैसी” रचनाएं पढीं।
हास्य कवि अनवर अंसारी ने “सिर्फ़ स्पेशल वाले छोले भटूरे खाकर भटूरा हुआ हूँ, मैने कौनसा किसी मंदिर का चंदा खाया है” सुना कर खूब रंग जमाया। कवियत्री नेहा अरोड़ा ने पढ़ा, “80 का दशक था, कितना सुहाना था, हर शख्स अपने आप में खुशियों का ख़ज़ाना था। न मोबाइल की चमक थी, न स्क्रीन का सिलसिला, फिर भी हर एक चेहरे पर हँसता ज़माना था”। कृष्णा गोयल ने “लक्ष्य जीतना है तो सोचिए बस यही, बाकी हैं तीर अभी मेरे कमान में”; गुरदीप गुल ने ग़ज़ल “मेरी ग़ज़लों, मेरी नज़्मों, अभी कागज़ पे न उतरो, अहसासे-लम्स, तिलिस्मे- हर्फ़ अभी सांसों में भरो” पेश की |
करिश्मा वर्मा ने नारी शक्ति पर पढ़ा “समस्त जगत में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करो, रणचंडी का रूप धार तुम शस्त्रों से श्रृंगार करो”। इसी क्रम में श्याम सुन्दर ने कहा “रामायण हमें सिखलाती तप, त्याग और प्रेम के गुण महान जीवन कैसे जीना है, हर जन को देती हैं ये ज्ञान”। पवन मुन्तजिर ने पढ़ा “बदला मौसम चक्र भी, बदला है संसार। मानव विषधर बन गया, मारे है फुंकार।“ अन्य रचनाकार थे सुश्री अशोक नादिर भंडारी, गणेश दत्त बजाज, सुदेश मौदगिल नूर, डॉक्टर तिलक सेठी, कीमती केसर और जगदीश सिंह खुशदिल। मंच संचालन कवि एवं साहित्यकार राजेश आत्रेय ने किया। कार्यकम के अंत में प्रो. सौभाग्य वर्धन ने सभी का धन्यवाद किया।
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