ग़ज़ल
हवाओं का रुख अब बदलने लगा है
हिमालय भी देखो पिघलने लगा हैज़माने ने करवट बदल ली है अब तो
दिया फिर मुहब्बत का जलने लगा हैबग़ावत के शोले उठे बस्तियों से
लहू आदमी का उबलने लगा हैनहीं रुक सकेगा ये रोके किसी के
दिलों में जो तूफ़ान उठने लगा हैअकेला जो बैठा था घबरा के घर में
वही आज सड़कों पे चलने लगा हैये थी रात लंबी मगर रात ही थी
अंधेरे का मंज़र बदलने लगा हैज़रा तुम गगन को निहारो तो “दानिश”
नया एक सूरज निकलने लगा है— मनमोहन सिंह ‘दानिश’
कविताएँ
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