Thursday, 17 September 2026
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राजस्थान में सीपीएम के बढ़ते कदम

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

पिछले दिनों राजस्थान में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में सीपीआई एम ने सफलता हासिल की है वह अप्रत्याशित है। खास तौर पर उन दक्षिण पंथी ताकतों के लिए जो यह मान चुकी हैं कि देश से वामपंथ खत्म हो चुका है। वैसे तो पिछले आम चुनाव में सीकर से कामरेड अमरा राम का लोकसभा के लिए चुना जाना एक संकेत दे चुका था लेकिन दक्षिणपंथी इसे अनदेखा कर रहे थे क्योंकि अमरा राम को इंडिया गठ बंधन का समर्थन प्राप्त था। पर सीकर के नोखा में जो जीत सीपीआई एम को मिली है वह असाधारण है। वहां बोर्ड की 45 में से सीपीआई एम ने 29 सीटों को जीत लिया। बंगाल, केरल और त्रिपुरा के बाद शायद राजस्थान पहला राज्य है जहां सीपीआई एम ने इस तरह की जीत हासिल की हो। नोखा में बीजेपी को 13 आज़ाद उम्मीदवारों को तीन सीटें मिली। वैसे सीपीआई एम ने पूरे राज्य में 192 प्रत्याशी खड़े किए थे जिनमें से 38 विजयी रहे।

तमिलनाडु में भी वाम दलों ने जो सफलता पाई है वह भी उनके हौसले को बढ़ाती है। तमिलनाडु में जो बहुत बड़ा फैसला सीपीआई और सीपीआई एम ने किया है वह है कि उस राज्य में केवल यही दोनों दल अकेले चुनाव में उतरेंगे। दूसरी किसी पार्टी के साथ गठजोड़ नहीं होगा। मेरे ख्याल से यह बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला है। इसके परिणाम जो भी हों पर कम्युनिस्ट दलों को ताकत जरूर मिलेगी। उनकी अपनी एक अलग पहचान बनेगी। अगर सीपीआई एम एल भी इस गठबंधन का हिस्सा बन जाए तो और बेहतर है। वैसे इन तीनों दलों के छात्र संगठनों ने पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन मिलके लड़ा था। वैसे लोग तो कम्युनिस्ट पार्टियों का विलय चाहते हैं। आज नहीं तो कल यह होना ही है। आम लोग और हालात इन दलों को विलय के लिए मजबूर कर ही देंगे। मार्क्स ने लिखा है कि “मैटर कंडीशंस” बदलने से आदमी की सोच बदलती है।

आज भी कई वामपंथी चाहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां इस लड़ाई में कांग्रेस का साथ दें। मैं उन्हें याद करा दूं कि सीपीआई शुरू से कांग्रेस का साथ देती आई है केवल इसलिए ताकि दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता में न आ जाएं। इसी चक्कर में उसने देश में आपातकाल का भी समर्थन किया। इंदिरागांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम को भी सराहा। अपना अस्तित्व मिटा कर कांग्रेस को बचाने में लगे रहे। पर नतीजा क्या हुआ? क्या दक्षिणपंथी रुक पाए? देश में फासीवाद नहीं आया? सब कुछ सामने है।
वाम दलों के नेतृत्व को समझना होगा कि कांग्रेस और बीजेपी का वर्ग चरित्र एक है। नोखा की जनता ने बता दिया है कि दक्षिणपंथी ताकतों का मुकाबला केवल वाम दल ही कर सकते हैं। यही कारण है कि नोखा में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। आज बंगाल और त्रिपुरा में भी लड़ाई वाम दलों और बीजेपी के बीच ही रह गई है। इन राज्यों में कांग्रेस लगभग नदारद है। किसान आंदोलन से लेकर छात्रों के आंदोलन तक को चलाने में वाम संगठन आगे रहे हालांकि गोदी मीडिया उन्हें अनदेखा कर उस श्रेय कुछ दूसरे तत्वों को देता रहा।

मौजूदा हालात में अगर कांग्रेस के साथ भी कोई तालमेल हो भी तो उसका नेतृत्व वाम दलों के हाथ होना चाहिए। बंगाल, त्रिपुरा, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार, राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्य हैं जहां कम्युनिस्ट पार्टियां अपनी अच्छी पहचान रखती हैं। इसके अलावा झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी वाम दलों का अच्छा काम है। इन राज्यों में अपने काम को वोटों में बदलने की ज़रूरत है। किसी भी लोकतंत्र में चुनावी जीत ज़रूरी है। इसलिए कांग्रेस के सहयोगी बनने की बजाए कांग्रेस को अपना सहयोगी बनाएं। आज देश वाम दलों को देख रहा है। देखना यह है कि वाम दल किसे देख रहे हैं।