Monday, 07 September 2026
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साक्ष्य अधिनियम के तहत सत्यापित प्रतिलिपि नही देना, सेवा में कमी, उपभोक्ता आयोग ने जारी किए नोटिस

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चंडीगढ, संजय कुमार मिश्रा:
जिला उपभोक्ता आयोग भदोही उत्तर प्रदेश ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत फीस लेकर भी सत्यापित प्रति लिपी नही देने को सेवा में कमी मानते हुए प्रतिवादी को नोटिस जारी किया है।
24 मई 2022 को वेदपुर निवासी कमलेश गुप्ता की शिकायत पर सुनवाई करते हुए आयोग ने तहसीलदार ज्ञानपुर, जनपद भदोही को 26 जून 2022 के लिए नोटिस जारी किया। अपने शिकायत में कमलेश ने आयोग की बताया कि उसने तहसीलदार से कुछ दस्तावेज की सत्यापित प्रति लिपी की मांग करते हुए भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 76 के तहत फीस के साथ आवेदन किया था लेकिन तहसीलदार के तरफ से मांगी गई प्रतिलिपि नही दी गई।
ज्ञात हो कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 76 मे यह प्रावधान है कि आप लीगल फीस देकर किसी भी जन अधिकारी से उनके पास उपलब्ध दस्तावेज की सत्यापित प्रतिलिपी मांग सकते हैं। अगर तय समय पर दस्तावेज की प्रतिलिपी नहीं मिलती है तो सेवा में कमी की शिकायत अपने जिले के उपभोक्ता मंच को दे सकते हैं, जहां से आप वांछित सूचना के साथ आर्थिक नुकसान के मुआवजे की भी मांग कर सकते हैं।
निम्नलिखित अदालती आदेश के मुताबिक भी उपरोक्त अधिकारों की पुष्टि की गई है।
1. सुप्रीम कोर्ट ने 13-09-2012 को रिट संख्या 210 ऑफ 2012 (नामित शर्मा बनाम भारत सरकार) अपने आदेश के पैरा 24 मे कहा है कि सूचना के अधिकार की झलक भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के धारा 76 मे देखने को मिलती है जिसके तहत जन अधिकारी आमजन के द्वारा मांगी गई सूचना देने के लिये बाध्य है।
2. बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्रिमीनल पिटीशन संख्या 1194 ऑफ 2008 एवम 2331 ऑफ 2006 (सुहास भन्ड बनाम महाराष्ट्र सरकार) का निपटारा करते हुए 18-08-2009 को अपने आदेश के पैरा 10 मे कहा कि कम्पनी के रजिस्ट्रार का ऑफिस एक लोक दफ्तर है एवम वहां के सभी दस्तावेज भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 74 के तहत एक जन दस्तावेज है कोर्ट ने अपने आदेश के पैरा 11 मे कहा कि कंपनी रजिष्ट्रार एक जन ऑफिस है और वो अपने ऑफिस के दस्तावेज की सत्यपित प्रतिलिपी भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 76 के तहत आमजन को देने के लिये बाध्य है।
3. ओडिशा राज्य उप्भोक्ता आयोग ने चिन्तामणि मिश्रा बनाम तह्सीलदार खन्दापाडा के केस का निपटारा करते हुए 19-04-1991 को कहा कि फीस देकर सत्यापित प्रतिलिपी के लिये आवेदन एक पेड सर्विस है, और आवेदक एक उपभोक्ता है जो सेवा में कमी की शिकायत उपभोक्ता मंच को दे सकता है।
4. राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग नई दिल्ली ने पुनरीक्षण याचिका संख्या 2135 ऑफ 2000 (प्रभाकर ब्यानकोबा बनाम सिविल कोर्ट अधीक्षक) को निपटाते हुए 08-07-2002 को अपने आदेश के पैरा 11 मे कहा कि कोई भी व्यक्ति जो कुछ पाने के लिये पैसे खर्च करता है तो वह उपभोक्ता अधिनियम 1986 के तहत एक उपभोक्ता है। पैरा 15 पर आयोग ने कहा कि कोर्ट के आदेश की सत्यापित प्रतिलिपी को जारी करने की प्रक्रिया कोई न्यायिक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। पैरा 16 पर आयोग ने कहा कि उपरोक्त बातों से सहमति जताते हुए हम यह मानते हैं कि, फीस देकर सत्यपित प्रतिलिपि मांगने वाला आवेदक एक उपभोक्ता है एवम फीस लेकर सत्यापित प्रतिलिपी मुहैया कराना एक सेवा।
इसलिये अगर आप अपने सूचना अधिकार का प्रयोग करना चाहते हैं लेकिन सूचना अधिकार कानून 2005 पर सन्देह है या इस अधिनियम के तहत आपको वांछित जानकारी नही मिली, उल्टे सूचना आयोग में आपका ही आवेदन खारिज हो गया, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 को आजमायें, और वांछित सूचना नहीं मिलने पर सेवा मे कमी की शिकायत उप्भोक्ता मंच मे करें, सफलता जरूर मिलेगी।