Thursday, 29 October 2026
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यह बेचारी सरकार हमारी

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

बहुत पहले टीवी पर एक विज्ञापन आता था, ” यह बेचारा बोझ का मारा इसे चाहिए सिंकारा”। शायद मेरे शब्द कुछ आगे पीछे हो गए हों पर इसका लबोलुबाब यही है। कमोवेश ऐसी ही स्थित हमारी सरकार और व्यवस्था की है। बेचारी क्या करे इनका कोई मित्र बैंकों का अरबों रुपया ले कर चम्पत हो जाता है तो कभी दवा कंपनियों वाले 10 रुपए की दवा 10 हज़ार में बेच देते हैं। एम आर पी की पूरी फॉर्म कहीं लिखी नहीं होती।

सरकार बहुत निवेदन करती है कि भाई एम आर पी की पूरी फॉर्म यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस। अर्थात इस कीमत से अधिक पर आप बेच नहीं सकते पर दुकानदार इसे मिनिमम रिटेल प्राइस यानी कम से कम कीमत बता कर बेच देता है। कहता है इससे कम पर नहीं बेचा जा सकता। वह भी बेचारा क्या करे। उसने भी बच्चे पालने हैं। फिर सेहत विभाग के लोगों को भी खुश रखना पड़ता है। डॉक्टर्स ने परिवार सहित इन कम्पनियों के सर पर विदेशी दौरे करने होते हैं। फिर टेस्ट के लिए किसी खास प्रयोगशाला भेजा जाता है। वहां बाकायदा उस डॉक्टर का नाम लिखते हैं जिसने भेजा है। आखिर हिस्सा तो सब का है।

अब सरकार क्या करे अगर सरकारी अस्पताल अच्छे बना दे तो लोग, खास तौर पर एलीट क्लास, क्या करेगी। उन्हें तो मरीज़ से अधिक अपनी सुविधा का ध्यान होता है। निजी अस्पतालों में सेहत से जुड़े लोग ही नहीं लूटते बल्कि पूरी व्यवस्था ही लूट लेती है। गाड़ियों की पार्किंग फीस से लेकर वहां की कैंटीन तक दोनों हाथों से लूटने लगते हैं।

एक निजी अस्पताल की कैंटीन में चाय का एक कप 239 रुपए का सुन कर मेरे जैसे लोगों की तो चाय पीने की इच्छा ही खत्म हो जाती है। वहां आपको दाल रोटी नहीं मिलेगी। बस मैगी वगैरा खा कर पेट भर लो।

दवा कंपनियों को बेतहाशा मुनाफा देने के लिए पूरा इंतज़ाम किया गया है। जहां तक सरकारी अस्पतालों की बात है तो पीजीआई चंडीगढ़ एक अपवाद है। वहां गरीब की भी पूछ हो जाती है। डॉक्टर दिन रात एक कर देते हैं। हालांकि वहां भी कुछ मरीजों के अनुभव अच्छे नहीं रहे पर अपेक्षाकृत हालत अच्छे हैं।बाकी अस्पतालों में तो आपात स्थिति में भी डॉक्टर ही उपलब्ध नहीं होते। यह बात है बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों की, कस्बों और गांवों में तो स्थिति और भी बुरी है। पर सरकार असहाय है।

बेचारे पांच साल के लिए आए हैं फिर पता नहीं मौका मिले न मिले। तो अपनी आने वाली पीढ़ियों का इंतज़ाम इन पांच सालों में ही करना होता है। वैसे भी इनमें से अधिकतर ऐसे होते हैं जिन्हें कोई चपड़ासी की नौकरी भी न दे। तो भाई मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

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