ग़ज़ल
किसी को मुझे आज़माना नहीं है
किसी दर पे सर को झुकाना नहीं हैमिले हूर कोई या हो अप्सरा ही
मुझे दिल किसी से लगाना नहीं हैबहारों का मौसम तो आया है लेकिन
तेरे बिन ये बिल्कुल सुहाना नहीं हैमुसाफ़िर हैं हम तो रहेंगे सफ़र में
परिंदों का कोई ठिकाना नहीं हैकि हो बात कैसे करें गुफ्तगू क्या
कभी फोन उसने उठाना नहीं हैसरे आम करना है इज़हार मुझको
मुझे इश्क़ अपना छुपाना नहीं हैकरूं क्या ये कश्ती ये पतवार ‘दानिश’
मुझे पार दरिया के जाना नहीं है— मनमोहन सिंह ‘दानिश’
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