Thursday, 22 October 2026
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देश में नारी शक्ति को मज़बूत करने के लिए कानून दर कानून, पर टूटने लगे परिवार

जिस दर से कानून बने हैं, परिवारों के टूटने की रफ्तार भी वैसे ही बढ़ी

संजय कुमार मिश्रा

संयुक्त परिवार अपने देश का एक पारंपरिक पहचान है यानी एक ऐसा घर, जहां दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, भाई-बहन सब मिलकर रहते हैं, खुशीियों को बाँटते हैं और सुख-दुःख में एक-दूसरे का साथ देते हैं। लेकिन अफसोस धीरे-धीरे यह पारंपरिक व्यवस्था कमजोर होती जा रही है और एकल परिवार का चलन बढ़ता जा रहा है।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इसके क्या कारण है आइए विस्तार से जानते हैं —

आर्थिक स्वतंत्रता और महत्वाकांक्षा : –

आज के समय में व्यक्ति अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को अधिक महत्व देने लगा है। पहले संयुक्त परिवार में आमदनी और खर्चे साझा होते थे, लेकिन अब हर व्यक्ति चाहता है कि वह खुद कमाए और अपने अनुसार खर्च करे। करियर और व्यक्तिगत उन्नति को प्राथमिकता देने के कारण लोग संयुक्त परिवार से अलग हो रहे हैं।

रोजगार के अवसर और पलायन :

पहले लोग अपनी पैतृक संपत्ति पर निर्भर रहते थे, लेकिन अब बेहतर नौकरी और व्यवसाय के लिए लोग गाँव से शहर और फिर महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। काम की व्यस्तता और रहन-सहन के बढ़ते खर्चों के कारण वे अपने परिवार से दूर होने को मजबूर हो जाते हैं।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिक सोच :-

आज की पीढ़ी अपनी लाइफस्टाइल, फैसले और स्वतंत्रता को बहुत अधिक महत्व देती है। वे यह नहीं चाहते कि उनके जीवन में कोई दखल दे या उनके निर्णयों पर परिवार का कोई हस्तक्षेप हो। यही कारण है कि वे अलग रहना ज्यादा पसंद करते हैं।

बढ़ती जीवनशैली और भौतिकता :

संयुक्त परिवार में हर किसी की जरूरतों और इच्छाओं को संतुलित करना मुश्किल होता है। आधुनिक समय में लोग बड़े घर, महंगी गाड़ियाँ, उच्चस्तरीय जीवनशैली और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता देने लगे हैं, जिससे वे संयुक्त परिवार से दूर हो रहे हैं।

वैचारिक मतभेद और पीढ़ियों का टकराव :

समय के साथ पीढ़ियों के सोचने-समझने का तरीका बदल जाता है। बुजुर्ग पारंपरिक रीति-रिवाजों और अनुशासन को महत्व देते हैं, जबकि युवा पीढ़ी खुले विचारों वाली होती है। यह वैचारिक टकराव तनाव को जन्म देता है, जिससे कई बार लोग अलग होने का निर्णय ले लेते हैं।

विवाह और रिश्तों में बदलाव :

आजकल प्रेम विवाह, अंतरजातीय विवाह और अंतरधार्मिक विवाह आम हो गए हैं। ऐसे में कई बार परिवार के लोग नई बहू या दामाद को पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर पाते, जिससे परिवार में मतभेद बढ़ते हैं और परिवार बिखर जाता है।

घरेलू कलह और संपत्ति विवाद :

समय के साथ संपत्ति के बंटवारे को लेकर परिवारों में कलह बढ़ती जा रही है। कई बार भाई-भाई के बीच, चाचा-भतीजे या अन्य रिश्तेदारों के बीच विवाद इतने बढ़ जाते हैं कि वे अलग रहने को मजबूर हो जाते हैं।

पश्चिमी संस्कृति और डिजिटल युग :

सोशल मीडिया, फिल्मों, वेब सीरीज और पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव के कारण आज की पीढ़ी संयुक्त परिवार की परंपरा को पिछड़ा मानने लगी है। वे अकेले रहने, अपनी मर्जी से जीवन जीने और ‘पर्सनल स्पेस’ को प्राथमिकता देने लगे हैं।

महिलाओं की स्थिति में बदलाव :

पहले महिलाएँ घर की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब वे आत्मनिर्भर हो रही हैं, जॉब कर रही हैं और अपने फैसले खुद ले रही हैं। ऐसे में वे संयुक्त परिवार की पारंपरिक जिम्मेदारियों को निभाने में कठिनाई महसूस करती हैं, जिससे एकल परिवार की ओर रुझान बढ़ रहा है।

शिक्षा और जागरूकता में वृद्धि :
पहले लोगों की सोच सीमित होती थी, लेकिन अब शिक्षा ने लोगों को जागरूक कर दिया है। वे अपने अधिकारों को समझने लगे हैं, जिससे वे संयुक्त परिवार की परंपराओं और बंदिशों को तोड़कर स्वतंत्र जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं।

न्यायालय के निर्णय : कई बार अदालती फैसले या भरण-पोषण के आदेश परिवार के बचे सदस्यों के बीच आर्थिक और मानसिक दूरियां पैदा कर देते हैं। कोर्ट ने यूुवाओ को एटीएम मशीन बना कर रख दिया है।महिलाओं के लिए महिला आयोग एवं कई कानुून लेकिन पुरुषों के लिए कुछ नहीं

महिला आयोग के अलावा महिला-विशिष्ट कानून जैसे :- अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961, THE IMMORAL TRAFFIC (PREVENTION) ACT, 1956, सती प्रथा (रोकथाम) अधिनियम, 1987, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005. कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013, महिलाओं का अशिष्ट चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986 

उप्ररोक्त वजह से अब शादी को जीवनभर का बंधन मानने की धारणा कमजोर हो रही है। कई युवा बिना कानूनी और सामाजिक दवाब के साथ रहना पसंद करते हैं। लिव-इन रिलेशनशिप और ओपन रिलेशनशिप का बढ़ता चलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ये उदाहरण दिखाते हैं कि आज के युवा अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं और शादी को केवल एक विकल्प के रूप में देखते हैं, न कि जीवन का जरूरी हिस्सा मानते हैं ।

संयुक्त परिवार के विघटन के प्रभाव :

संयुक्त परिवार के टूटने से कई सामाजिक और भावनात्मक दिक्कतें सामने आई हैं—
✅ बुजुर्गों की उपेक्षा बढ़ गई है।
✅ रिश्तों में आत्मीयता कम हो गई है।
✅ बच्चों को दादा-दादी और चाचा-चाची का प्यार नहीं मिलता।
✅ सामाजिक सुरक्षा और पारिवारिक सहयोग कम हो गया है।
✅ मानसिक तनाव और अकेलापन बढ़ गया है।

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