Monday, 31 August 2026
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‘एकम न्याय संवाद’ आयोजित: सांसदों और न्यायिक क्षेत्र के दिग्गजों ने राष्ट्रीय पुरुष आयोग की आवश्यकता पर किया मंथन

फेस2न्यूज /चण्डीगढ़

पुरुषों से जुड़े कानूनी और सामाजिक मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण संवाद चंडीगढ़ में आयोजित किया गया। एकम न्याय फाउंडेशन द्वारा पंजाब एवं हरियाणा बार काउंसिल, चंडीगढ़ स्थित लॉ भवन में ‘एकम न्याय संवाद’ का आयोजन किया गया। सम्मेलन का विषय था— “न्याय का संतुलन: निर्दोषों की रक्षा करते हुए कमजोर वर्ग को सशक्त बनाना।”

सम्मेलन में डॉ. अशोक कुमार मित्तल, राज्यसभा सांसद और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। वहीं न्यायमूर्ति एम.एम. कुमार, जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सम्मानित अतिथि रहे।

कार्यक्रम में न्यायमूर्ति रितु बाहरी, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश, श्री संजीव जिंदल, पूर्व अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मल्होत्रा, वरिष्ठ अधिवक्ता क्षितिज शर्मा, डॉ. निधि शर्मा, यूआईएलएस, मनोवैज्ञानिक सीमा गुप्ता मित्तल, एक्टिविस्ट अनमोल डांग और पत्रकार डिप्सी सग्गू सहित कई प्रतिष्ठित वक्ताओं ने भाग लिया।

पुरुषों के लिए राष्ट्रीय आयोग की आवश्यकता पर बोले डॉ. अशोक मित्तल

सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. अशोक कुमार मित्तल ने कहा, “दर्द का कोई जेंडर नहीं होता, अपराध का कोई जेंडर नहीं होता, तो फिर कानून और न्याय का जेंडर क्यों होना चाहिए?” उन्होंने पुरुषों के लिए भी ऐसा मंच उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया, जहां उनकी शिकायतों और समस्याओं को सुना जा सके। वह भारत में राष्ट्रीय पुरुष आयोग की स्थापना के लिए राज्यसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश करने की दिशा में काम कर रहे हैं। डॉ. मित्तल ने एकम न्याय फाउंडेशन के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि पुरुषों से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन समाज में मौजूद एक महत्वपूर्ण कमी को पूरा कर रहे हैं और पुरुषों के सामने आ रही समस्याओं से संबंधित आंकड़े भी उपलब्ध करा रहे हैं।

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने न्याय व्यवस्था में संतुलन पर दिया जोर

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने सम्मेलन के मुख्य विषय “न्याय का संतुलन: निर्दोषों की रक्षा करते हुए कमजोर वर्ग को सशक्त बनाना” पर मुख्य वक्तव्य दिया।
उन्होंने कहा कि देश में महिलाओं के लिए मंत्रालय और आयोग हैं, बच्चों के लिए भी मंत्रालय और आयोग हैं तथा वरिष्ठ नागरिकों के लिए कानून है, लेकिन “हमारे पास पुरुषों के लिए ऐसा कोई मंच निश्चित रूप से नहीं है।”

राज्यसभा सांसद डॉ. अशोक मित्तल द्वारा राष्ट्रीय पुरुष आयोग के लिए प्राइवेट मेंबर बिल लाया जाना सराहनीय है। संविधान कानून के समक्ष समानता और सभी के लिए समान अधिकार की बात करता है, लेकिन यह देखना जरूरी है कि क्या आज वास्तव में यह समानता पूरी तरह लागू हो रही है। न्यायमूर्ति बिंदल ने कहा कि एकम न्याय फाउंडेशन पुरुषों के सामने आ रही समस्याओं को सामने लाने और उनसे संबंधित आंकड़े जुटाने का सराहनीय कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके माध्यम से समस्या की गंभीरता को समझने में मदद मिलती है। न्यायविदों के रूप में उनका प्रयास न्याय व्यवस्था में संतुलन बनाए रखना है और अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कानूनों के दुरुपयोग और गलत इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं।

आज कई मामलों में वित्तीय विवाद और रिश्तों से जुड़े विवादों के कारण दुष्कर्म के मामले दर्ज किए जा रहे हैं, जिससे ऐसे कानूनों की गंभीरता कम होती है। वहीं दूसरी ओर, कई वास्तविक पीड़ित महिलाएं भी हैं जो मामले दर्ज नहीं करातीं। न्यायमूर्ति बिंदल ने वैवाहिक विवादों में मुकदमे से पहले मध्यस्थता की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराधों को छोड़कर वैवाहिक विवादों में मुकदमे से पहले मध्यस्थता की व्यवस्था होनी चाहिए।

अपराध के पीड़ितों के साथ-साथ “प्रक्रिया के भी पीड़ित” होते हैं। झूठे आरोपों के कारण वर्षों या दशकों तक कानूनी प्रक्रिया में फंसे रहने वाले पुरुष भी ऐसी स्थिति के पीड़ित हैं। वर्षों बाद जब वे अपना नाम साफ करवा पाते हैं, तब तक जो कुछ वे खो चुके होते हैं, उसे वापस नहीं पाया जा सकता।
उन्होंने समाज की सोच में बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि लोगों को एक-दूसरे को दुश्मन समझकर दूसरे पक्ष को जेल भेजने पर आमादा नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा, “एकम न्याय फाउंडेशन बहुत अच्छा काम कर रहा है और आज के पैनल में जिन विषयों पर चर्चा हुई, वे बेहद प्रासंगिक हैं। शायद एक दिन हमारे पास ऐसे कानून होंगे जो सभी की मदद करेंगे।”

दीपिका नारायण भारद्वाज ने कहा—हर जेंडर की आवाज सुनी जाना जरूरी

एकम न्याय फाउंडेशन की संस्थापक-निदेशक, पत्रकार और डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर दीपिका नारायण भारद्वाज ने कहा कि एकम न्याय संवाद, चंडीगढ़ में इतने प्रतिष्ठित वक्ताओं की उपस्थिति और उनके विचार साझा करना उनके लिए सम्मान की बात है। यह समाज को प्रभावित करने वाले बेहद महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक संवाद रहा। एक प्रगतिशील और स्वस्थ समाज वही है, जहां हर जेंडर की आवाज सुनी जाए और सभी के साथ समान व्यवहार किया जाए।
उन्होंने कहा कि पुरुषों का पीड़ित होना भी आज एक सामाजिक वास्तविकता है और उनका प्रयास है कि इन मुद्दों पर चर्चा को केवल अदालतों के फैसलों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इन्हें आम लोगों के बीच सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए।

‘हसबैंड मर्डर बाय वाइफ एंड सुसाइड रिपोर्ट’ जारी

कार्यक्रम के दौरान पत्नियों द्वारा की गई पतियों की हत्या एवं उनके कार पतियों द्वारा आत्महत्या करने के मामलों बारे रिपोर्ट भी जारी की गई।
एकम न्याय फाउंडेशन के अनुसार, संगठन ने पिछले तीन वर्षों के दौरान व्यभिचार, झूठे आरोपों और वैवाहिक उत्पीड़न से जुड़े पुरुषों की हत्या और आत्महत्या के 2,000 से अधिक मामलों का दस्तावेजीकरण किया है।

किन मुद्दों पर हुई चर्चा?

माता-पिता के अलगाव तथा बच्चों की देखभाल को लेकर विवादों के कारण बच्चों और माता-पिता पर पड़ने वाले भावनात्मक प्रभाव पर चर्चा हुई।
यौन अपराधों से संबंधित शिकायतों में सहमति, सुरक्षा और उचित कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी चुनौतियों पर विचार किया गया। इसके अलावा वैवाहिक विवादों और हिंसा में कानूनों के कथित दुरुपयोग जैसे मुद्दे भी चर्चा का हिस्सा रहे।

पंजाब में विवाह से जुड़े धोखाधड़ी के मामलों, विदेश जाने की इच्छा और उससे जुड़ी समस्याओं तथा पुरुषों में आत्महत्या जैसे मुद्दों पर भी विशेष चर्चा हुई—ऐसे विषय जिन्हें अक्सर पर्याप्त सार्वजनिक ध्यान नहीं मिल पाता।

एकम न्याय संवाद की श्रृंखला

एकम न्याय संवाद, एकम न्याय फाउंडेशन द्वारा आयोजित सम्मेलनों की श्रृंखला है। इसका उद्देश्य आम लोगों के जीवन पर सीधे प्रभाव डालने वाले कानूनी मुद्दों पर चर्चा को आगे बढ़ाना है। चंडीगढ़ से पहले मुंबई में भी एक संवाद आयोजित किया गया था, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति साधना जाधव और न्यायमूर्ति रोशन दलवी ने भाग लिया था। वहां पुरुषों से जुड़े मुद्दों, पुरुषों में बढ़ती आत्महत्याओं और बच्चों की साझा अभिभावकीय देखभाल जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
2025 में आयोजित एकम न्याय राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने कहा था कि समान जेंडर न्याय और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रियाओं की वकालत करना किसी को महिला विरोधी नहीं बनाता।

कार्यक्रम में ऐसे लोगों ने भी भाग लिया, जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से झूठे आरोपों और लंबे समय तक चलने वाले कानूनी विवादों का सामना किया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, छात्रों और आम लोगों ने भी संवाद में भागीदारी की।आयोजकों के अनुसार, न्यायपालिका, कानूनी क्षेत्र, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स, छात्रों और आम जनता को एक ही मंच पर लाने से चंडीगढ़ में इस स्तर पर आयोजित यह कार्यक्रम अपनी तरह का एक महत्वपूर्ण संवाद बन गया।