– रोशन लाल ‘रौशन’
मिल-बैठें जब लोग, तो बातों का मेला लग जाता है,
हँसी-मज़ाक के चंचल रंग में, हर कोई रँग जाता है।
मज़ाक करने और उड़ाने में, अंतर पाया जाता है,
एक में होता निर्मल परिहास, दूजे में उपहास नज़र आता है।
परिहास अगर हो महफ़िल में, तो सबका मन बहलता है,
उपहास अगर हो किसी का, तो मन को बुरा लगता है।
परिहास से होता मनोरंजन, हर चेहरा खिल-खिल जाता है,
उपहास से दिल को ठेस लगे, रिश्तों में तनाव आ जाता है।
मीठे संवादों से समस्याओं का भी, सीधा हल निकल आता है,
विवादों में पड़कर अक्सर, आपसी सौहार्द भी मिट जाता है।
हर मानव की सोच-समझ, भले ही एक सीमा को बतलाता है,
ईश्वर की रचना में हर इंसान, अद्वितीय ही बन कर आता है।
दिलों को जोड़े जो बातों से, वही सच्चा इंसान कहलाता है,
उलझे हुए इन रिश्तों को बस, आदर-भाव ही सुलझा पाता है।
कहे ‘रोशन’ ये बात पते की, जो ये सारा जग बतलाता है,
संवाद और परिहास से ही तो, यह जीवन सुंदर बन जाता है।