— रोशन लाल ‘रौशन’
किसी भी महान और सभ्य राष्ट्र की नींव उसके नागरिकों की जागरूकता और उनके कर्तव्यों के निर्वहन पर टिकी होती है। एक लोकतांत्रिक देश में, जहाँ संविधान ही सर्वोच्च है, वहां नागरिकों का अपने अधिकारों और उससे भी अधिक अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना नितांत आवश्यक है।
कर्तव्यों का भान हो, अधिकारों का हो ज्ञान,
तभी तो बनेगा अपना भारत देश महान।
शिक्षा के पन्नों में जब संविधान जुड़ेगा,
तभी अज्ञानता के गहरे अंधेरों से देश मुड़ेगा।
वर्तमान परिदृश्य में यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि देश के नागरिक अपने कर्तव्यों को सही ढंग से जानें और पहचानें। यह तभी संभव है जब भारत के संविधान को विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में एक अनिवार्य विषय के तौर पर शामिल किया जाए। यदि प्रतिदिन केवल 40 मिनट का एक पीरियड संविधान और कानून की बुनियादी शिक्षा के लिए निर्धारित किया जाए, तो इसके परिणाम दूरगामी और चमत्कारी हो सकते हैं।
इस पहल से आम भारतीय नागरिक बचपन से ही देश के कानून को सरलता से समझ सकेगा। जब नींव मजबूत होगी, तो नागरिक स्वतः ही जागरूक होंगे। यह जागरूकता समाज में एक बड़ा बदलाव लाएगी, जिससे आपराधिक प्रवृत्तियों पर लगाम लगेगी और हम एक अपराध-मुक्त समाज की ओर कदम बढ़ा सकेंगे।
कानून की दुनिया में एक प्रसिद्ध कहावत है कि “कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं है” (Ignorance of law is no excuse)। परंतु यथार्थ यह भी है कि समाज में कई गलतियां या अपराध ऐसे होते हैं, जो केवल कानूनी जानकारी के अभाव में अनजाने में घटित हो जाते हैं। यदि स्कूली स्तर पर ही कानूनी शिक्षा दी जाए, तो अनजाने में होने वाले इन अपराधों में निश्चय ही भारी कमी लाई जा सकती है।
अपराधों के ग्राफ में आने वाली यह कमी देश के लिए एक वरदान साबित होगी। आज हमारे देश की असीमित ऊर्जा और संसाधन अपराधों से निपटने में खर्च हो जाते हैं। यदि अपराध कम होंगे, तो वही शेष ऊर्जा देश के उत्थान, विकास और नवनिर्माण के काम आ सकेगी।
इसके साथ ही, इसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव हमारी न्यायपालिका पर पड़ेगा। आज हमारी अदालतों में लाखों केस लंबित हैं। अपराध कम होने से अदालतों पर मुकदमों का यह भारी बोझ घटेगा, जिससे न्याय प्रक्रिया में तेजी आएगी और आम आदमी को त्वरित न्याय मिलना आसान हो जाएगा।
अदालतों का बोझ घटे, और मिले त्वरित न्याय,
राष्ट्र के उत्थान में ही लगे, हर नागरिक की आय।
कानून की समझ से जब हर युवा हमारा सजेगा,
तभी विश्व पटल पर सशक्त भारत का डंका बजेगा।
समय आ गया है कि शिक्षा मंत्रालय इस दिशा में गंभीरता से विचार करे। पाठ्यक्रम में संविधान और बुनियादी कानून को शामिल करने के लिए ठोस और त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता है। यह केवल एक विषय नहीं, बल्कि एक सशक्त, सुरक्षित और न्यायप्रिय भारत के निर्माण का महामंत्र है।