-रोशन लाल ‘रौशन’
जिंदगी के सफर में अक्सर हम दो ऐसे पड़ावों से गुजरते हैं जहाँ जुबान पर ताला होता है, मगर उनका गहराई से अहसास करें तो दोनों की जमीन बिल्कुल अलग होती है। एक तरफ जहाँ ‘खामोशी’ बाहरी परिस्थितियों और विवशता का परिणाम है, वहीं दूसरी तरफ ‘मौन’ चेतना और आंतरिक शांति का सधा हुआ निर्णय है।
दर्द की हद से गुजर कर जो जुबां खामोश है,
सोचिए ‘रोशन’ यहाँ किस बात पर आगोश है।
खामोशी एक प्रकार की मजबूरी या प्रतिक्रिया है। यह अक्सर गुस्से, नाराजगी, डर, उदासी या शब्दों के अभाव से जन्म लेती है। खामोशी के वक्त हमारे होंठ भले ही बंद हों, लेकिन भीतर विचारों और शिकायतों का भारी तूफान चल रहा होता है। यह मन की उलझनों का बोझ है जो दिलों के बीच दूरियाँ बढ़ा देता है। जैसे किसी तीखे विवाद के बाद कमरे में छा जाने वाली चुप्पी खामोशी कहलाती है, जिसमें संवाद रुक जाता है पर तल्खी बरकरार रहती है।
इसके विपरीत, मौन कोई लाचारी नहीं बल्कि एक गहरी साधना है। यह होशपूर्वक लिया गया वह निर्णय है जहाँ हम अपनी इच्छा से शब्दों को विराम देते हैं ताकि अंतरात्मा की आवाज को सुना जा सके। मौन में केवल बाहरी शोर ही नहीं थमता, बल्कि भीतर का कोलाहल भी शांत हो जाता है। यह व्यक्ति को हल्का और ऊर्जावान बनाता है। जैसे किसी संत-ऋषि का ध्यानस्थ होना या किसी प्रिय की बात को पूरी तन्मयता से सुनने के लिए खुद को शांत कर लेना।
सीधे शब्दों में कहें तो खामोशी वह स्थिति है जहाँ आप बोलना चाहते हैं पर हालात या बेबसी की वजह से बोल नहीं पाते। इसके उलट, मौन वह अवस्था है जहाँ आप बोल सकते हैं, आपके पास शब्द भी हैं, पर आप अपनी मर्जी से बोलना नहीं चाहते। खामोशी हमें शब्दों से बचाती है, जबकि मौन हमें शब्दों की गहराई और अर्थ समझा देता है। खामोशी में इंसान अपने ही अंदर घुमड़ रहे विचारों को सुनता है और उसमें उलझा रहता है जबकि मौन में अस्तित्व की सुनता है। इसीलिए कहा भी गया है कि खामोशी ओढ़नी पड़ती है, पर मौन साधना पड़ता है।
शोर से बचकर जो पाया है सुकून-ए-दिल कहीं,
उस मुकम्मल मौन में ‘रोशन’ बसा संसार है।