— रोशन लाल ‘रौशन‘
भूल बैठे हैं ज़माने की चमक में जो शिफ़ा का फ़न,
उसी आयुर्वेद से हर दर्द को मिटाएगा ‘रोशन‘।
भारत का प्राचीन आयुर्वेदिक विज्ञान केवल रोगों के उपचार की कोई साधारण पद्धति नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण स्वास्थ्य, दीर्घायु और संतुलित जीवन जीने का एक प्रामाणिक दर्शन है। लगभग 5,000 वर्ष पूर्व भारत में जन्मी यह विधा इस मूल सिद्धांत पर काम करती है कि हमारा शरीर पांच तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) से बना है। ये तत्व शरीर में तीन मुख्य ऊर्जाओं—वात (गति और रक्त प्रवाह), पित्त (पाचन और चयापचय), और कफ (संरचना और रोग प्रतिरोधक क्षमता)—के रूप में कार्य करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, जब ये ‘त्रिदोष’ संतुलन में रहते हैं, तो व्यक्ति स्वस्थ रहता है; और इनके असंतुलित होने पर ही बीमारियां जन्म लेती हैं। यह पद्धति बीमारी के लक्षणों को दबाने के बजाय इन दोषों को संतुलित कर रोग को जड़ से खत्म करती है।
वर्तमान में, भारत सरकार ने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को ‘आयुष’ के तहत संरक्षित किया है, जिसमें आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी और सोवा-रिग्पा शामिल हैं। इन सबमें आयुर्वेद का दायरा सबसे विस्तृत है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समय के साथ, या षड्यंत्रवश, इस वैज्ञानिक ज्ञान को केवल ‘घरेलू नुस्खों’ तक सीमित मान लिया गया। असल में यह एक पूर्ण चिकित्सा विज्ञान है, जिसे प्राचीन काल में ही ‘अष्टांग आयुर्वेद’ (आठ अंगों) में बांटा गया था। इसमें कायचिकित्सा (Internal Medicine), शल्य तंत्र (Surgery), और कौमारभृत्य (Pediatrics) जैसी उन्नत शाखाएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, शरीर की गहरी शुद्धि के लिए आयुर्वेद में ‘पंचकर्म’ (वमन, विरेचन, बस्ति, नस्य और रक्तमोक्षण) जैसी डिटॉक्सिफिकेशन प्रक्रियाएं मौजूद हैं, जो शरीर से विषाक्त पदार्थों को पूरी तरह बाहर निकाल देती हैं।
आज की आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) ने वैज्ञानिक परीक्षणों और शल्य चिकित्सा के माध्यम से मानव जीवन को त्वरित राहत दी है, लेकिन यह पद्धति अत्यधिक खर्चीली है। इसके कारण आम आदमी अक्सर दवा माफिया के चक्रव्यूह में फंस जाता है। इसके विपरीत, आयुर्वेद प्राकृतिक जड़ी-बूटियों (जैसे तुलसी, नीम, अश्वगंधा) पर आधारित है, जिसके दुष्प्रभाव न के बराबर होते हैं और यह हर व्यक्ति की ‘प्रकृति’ के अनुसार व्यक्तिगत उपचार प्रदान करता है।
यदि देश और राज्य की सरकारें चाहती हैं कि हर नागरिक स्वस्थ रहे और दवा माफिया के चंगुल से मुक्त हो, तो आयुर्वेद को पुनः दैनिक जीवन और शिक्षा में स्थापित करना होगा। हमारे देश के हर गांव में जड़ी-बूटियों के रूप में आयुर्वेद का कच्चा माल सुलभ है, बस जानकारी का अभाव है। इस ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विद्यालयों और महाविद्यालयों में शुरू से ही आयुर्वेद और जड़ी-बूटियों की जानकारी के लिए एक अनिवार्य ‘पीरियड’ लागू होना चाहिए।
विद्यार्थी जीवन से ही खेल टूर्नामेंट्स की तर्ज पर तहसील, ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जड़ी-बूटी पहचान और आयुर्वेद ज्ञान की प्रतिस्पर्धाएं आयोजित करवानी चाहिए। इससे न केवल विद्यार्थियों में आयुर्वेद के प्रति आकर्षण बढ़ेगा, बल्कि वे आपात स्थिति या अस्वस्थ होने पर सस्ता और तुरंत प्राथमिक इलाज कर सकेंगे। आयुर्वेद का यह पुनरुत्थान हमें हमारी जड़ों से जोड़ेगा और एक स्वस्थ, सशक्त भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा।
बना ले गर ज़माना जड़ी-बूटियों को अपना रहबर,
तो सेहत के नूर से हर एक घर हो जाए ‘रोशन‘।