Tuesday, 14 April 2026
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साक्ष्य अधिनियम के तहत फ़ीस भुगतान कर सत्यापित प्रतिलिपि मांगने वाला आवेदक उपभोक्ता है: राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग

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चंडीगढ, संजय कुमार मिश्रा:
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने साक्ष्य अधिनियम के तहत फ़ीस का भुगतान कर सत्यापित प्रतिलिपि मांगने वाले आवेदक को उपभोक्ता कानून के तहत एक उपभोक्ता बताते हुए मध्य प्रदेश राज्य आयोग के फैसले को ख़ारिज कर दिया। मध्यप्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग ने ग्वालियर जिला उपभोक्ता आयोग के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा था कि, साक्ष्य अधिनियम के तहत फ़ीस का भुगतान कर सत्यापित प्रतिलिपि मांगने वाला आवेदक उपभोक्ता नहीं है और उसकी याचिका उपभोक्ता आयोग में सुनी नहीं जा सकती है।  (SUBHEAD)
मामले अनुसार ग्वालियर निवासी चंद्रसेन बाथम ने तहसीलदार से भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के तहत फ़ीस का भुगतान करते हुए कुछ पब्लिक दस्तावेज की सत्यापित प्रतिलिपि मांगी थी जिसे अनसुना कर दिया गया था। सेवा में कमी की शिकायत ग्वालियर जिला उपभोक्ता आयोग में दी गई, शिकायत संख्या 543 ऑफ़ 2010 पर सुनवाई करते हुए जिला आयोग ने कहा कि, साक्ष्य अधिनियम के तहत फ़ीस का भुगतान कर सत्यापित प्रतिलिपि मांगने वाला आवेदक उपभोक्ता नहीं है, और अंततः 13 सितंबर 2010 को याचिका ख़ारिज कर दी गई। 
शिकायतकर्ता ने जिला आयोग ने इस निर्णय को मध्यप्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी, राज्य आयोग ने अपील संख्या JA / 10 / 2348 पर सुनवाई करते हुए जिला आयोग के फैसले से अपनी सहमती जताई और 12 नवम्बर 2010 को अपील ख़ारिज कर दी।
राज्य आयोग के फैसले के खिलाफ राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में अपील की गई। पुनरीक्षण याचिका संख्या 4710 ऑफ़ 2010 पर सुनवाई करते हुए आयोग ने तहसीलदार ग्वालियर को नोटिस जारी किया, लेकिन नोटिस के बावजूद भी वो 10 जनवरी 2011 को सुनवाई में उपस्थित नहीं हुआ। फाइनल सुनवाई 10 मार्च 2011 को हुई और आयोग ने विभिन्न पहलुओं पर गौर करते हुए कहा- साक्ष्य अधिनियम के तहत फ़ीस का भुगतान कर सत्यापित प्रतिलिपि मांगने वाला आवेदक एक उपभोक्ता है और उसकी याचिका उपभोक्ता आयोग में सुनी जा सकती है।
आयोग ने ओडिशा राज्य आयोग के चिंतामणि मिश्रा बनाम तहसीलदार खंदापादा केस के निर्णय दिनांक 19 अप्रैल 1991 का जिक्र किया, आयोग ने प्रभाकर व्यान्कोबा बनाम सिविल कोर्ट में राष्ट्रीय आयोग के निर्णय दिनांक 8 जुलाई 2002 के निर्णय का भी जिक्र किया, और कहा कि उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि फ़ीस का भुगतान कर सत्यापित प्रतिलिपि मांगने वाला आवेदक एक उपभोक्ता है और तहसीलदार सेवा प्रादाता क्योंकि फ़ीस लेकर सत्यापित प्रतिलिपि देना एक न्यायिक कार्य नहीं बल्कि यह एक प्रशासनिक कार्य है, जिसके तहत अगर सेवा में कमी आती है तो उसकी शिकायत उपभोक्ता आयोग में सुनी जा सकती है।