Tuesday, 22 September 2026
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मां बोली के बड़े पैरोकार मां को मां तो कहें, मम्मी क्यों कहते हैं?

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(MOREPIC1) अमृतसर, फेस2न्यूज:
देश की आजादी के वर्षों बाद ही सही राष्ट्रीय भाषाओं के लिए आदर और सम्मान का भाव बहुत अच्छा लगा। जो काम 1950 तक होना चाहिए था वह अब शुरू हो रहा है। अफसोस यह है कि अपनी भाषाओं के नाम पर जो शोर मचाया जा रहा है वह केवल जुबान का है, दिल का नहीं।
पंजाब में पूर्व मंत्री रहीं श्रीमती लक्ष्मीकांता चावला ने सवाल उठाया है कि पंजाबी या अन्य भारतीय भाषाओं के पैरोकार या भाषा के नाम पर लड़ाने वाले या भाषा के नाम पर अलग राज्य बनाने वाले यह बताएं कि अंग्रेजी तो उन्हें मां के दूध की तरह पच जाती है, पर स्वदेशी भाषाओं के नाम पर क्यों लड़ते हैं। पंजाब में भी मुख्यमंत्री श्री मान ने मां बोली दिवस मनाया। बड़े—बड़े विज्ञापन दिए, घोषणाएं कीं, पर जहां तक मैं जानती हूं कि बहुत से मंत्री अपने हस्ताक्षर डायर की भाषा में करते हैं। जरा होटलों के नाम देखिए, अधिकतर अंग्रेजी में हैं। ताजा—ताजा स्कूल आफ एमिनेंस खोला है। क्या इसके लिए पंजाबी शब्द कोई नहीं मिला। स्मार्ट स्कूलों की परिभाषा यह बताई कि अंग्रेजी माध्यम होगा और नेक टाई लगाई जाएगी। यूनिवर्सिटियों के दीक्षांत समारोह में अंग्रेजों की जूठन काले गाउन का बोलबाला और अधिकतर विदेशी भाषाओं का ही प्रभाव दिखाई देता है। याद रखना होगा पहले सफाई अपने घर से की जाती है। जिन नेताओं के बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ते हैं, जिनकी सुबह गुड मार्निंग और रात गुड नाइट से चलती है उनके भाषणों का कोई असर होने वाला नहीं।
याद रखो भारतेंदु जी का संदेश—
अपनी भाषा है भली भलो अपनो देश,
जो कछु है अपनो भलो, यही राष्ट्र संदेश।