Tuesday, 06 October 2026
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फर्जी पीएचडी प्रकरण: सेवा से हटाए गए तीन असिस्टेंट प्रोफेसर अंतरिम राहत के बाद फिर हुए कार्यभार ग्रहण

चण्डीगढ़ : फर्जी पीएचडी डिग्रियों के आधार पर नियुक्ति के आरोपों के चलते 3 जुलाई 2026 को सेवा से हटाए गए डीएवी संस्थानों के तीन असिस्टेंट प्रोफेसरों ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से प्राप्त अंतरिम राहत के बाद पुनः कार्यभार ग्रहण कर लिया है। इनमें डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ की मंदीप जोसन, डीएवी कॉलेज फॉर विमेन, फिरोजपुर के विनोद कुमार तथा डीएवी कॉलेज, जलालाबाद की शालिका रानी शामिल हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त 2026 को निर्धारित है।

यह घटनाक्रम कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। पंजाब यूनिवर्सिटी द्वारा इन नियुक्तियों की स्वीकृति वापस लेने तथा संबंधित डीएवी कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी द्वारा जारी किए गए सेवा समाप्ति आदेशों में ऐसी कौन-सी कानूनी या प्रक्रियागत कमियां रह गईं, जिनके आधार पर संबंधित शिक्षकों को अंतरिम राहत प्राप्त हो गई?

इस पूरे प्रकरण ने शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही और नियामकीय व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यदि संबंधित पीएचडी डिग्रियों को सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न सक्षम प्राधिकारियों द्वारा अवैध माना जा चुका था, तो ऐसे मामलों में नियुक्तियां वर्षों तक कैसे बनी रहीं और अब भी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान शिक्षण कार्य के लिए कैसे अंतरिम स्टे मिली? इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य की न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया से ही स्पष्ट हो सकेंगे।

चंडीगढ़ के आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ. राजिंदर के. सिंगला द्वारा उजागर किए गए इस प्रकरण से संबंधित बड़ी संख्या में दस्तावेजी साक्ष्य एकत्र किए जा चुके हैं, जो कई महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर संकेत करते हैं—

यदि संबंधित डिग्रियां 13 सितंबर 2013 के बाद अवैध मानी जा चुकी थीं, तो ऐसे नियुक्त व्यक्ति लगभग 13 वर्षों तक सेवा में कैसे बने रहे?

यदि सीएमजे यूनिवर्सिटी, शिलांग की डिग्रियों वाले अनेक छात्रों को शैक्षणिक सत्र 2013-14 में ही निकलना पड़ा था, तो क्या नियुक्त कर्मचारियों के मामलों में अलग मानदंड अपनाए गए?

पंजाब यूनिवर्सिटी सिंडिकेट द्वारा 27 जुलाई 2013 को सीएमजे यूनिवर्सिटी की डिग्रियों को मान्यता न देने के निर्णय के बावजूद बाद के वर्षों में कुछ नियुक्तियों को तत्कालीन वाइसचांसलर प्रोफेसर अरुण कुमार ग्रोवर द्वारा स्वीकृति कैसे प्रदान की गई?

अक्टूबर 2010 में कार्य प्रारंभ करने वाली सीएमजे यूनिवर्सिटी से दिसंबर 2012 में पीएचडी डिग्री प्रदान किए जाने की समयावधि भी जांच और सार्वजनिक स्पष्टीकरण का विषय है।

यह पूरा प्रकरण केवल तीन व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में नियुक्तियों की पारदर्शिता, विश्वविद्यालयों की जवाबदेही तथा नियामकीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली से जुड़े व्यापक प्रश्न उठाता है। आने वाले समय में न्यायालय की कार्यवाही और संबंधित अभिलेख ही इन प्रश्नों पर अंतिम स्थिति स्पष्ट करेंगे।

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