दीपक सिंह /चण्डीगढ़ :
जब आकाश में श्याम मेघ घिर आते हैं और मरुधरा से लेकर हरित भूमि तक, समस्त धरातल वर्षा की बूंदों से सराबोर हो उठता है, तब प्रकृति अपने रूप का नया आवरण ओढ़ती है। इसी पावन बेला में भारतीय संस्कृति की अध्यात्म-धारा में एक अद्भुत और गूढ़ पर्व का अभ्युदय होता है—जिसे हम ‘चातुर्मास’ कहते हैं।
क्या आपने कभी गहराई से विचार किया है कि जो जैन साधु-सन्त सम्पूर्ण वर्ष ‘विहार’ करते हैं, एक ग्राम से दूसरे ग्राम निरन्तर नंगे पांव पदयात्रा करते रहते हैं, वे आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी आते ही अचानक अपने चरणों की गति को विराम क्यों दे देते हैं? आखिर क्या रहस्य है इन चार महीनों के मौन, ठहराव और एकनिष्ठ साधना के पीछे?
जैन धर्म का चातुर्मास केवल एक कर्म-काण्ड या धार्मिक औपचारिकता नहीं है; यह तो सम्पूर्ण जीव-जगत के प्रति उस अथाह प्रेम, करुणा और संवेदना का जीवन्त स्वरूप है, जिसकी मिसाल सम्पूर्ण मानव इतिहास में विरली ही मिलती है।प्रकृति का नवजीवन और अहिंसा का अनुपम विस्तार—
वर्षा ऋतु केवल वर्षा का आगमन नहीं होती, अपितु यह अनगिनत सूक्ष्म जीवों के जन्म और अंकुरण का काल होती है। सूखी मिट्टी में छिपे नन्हें कीट, जल की बूंदों से पनपने वाले असंख्यात जीव, हरी-भरी वनस्पतियों पर थिरकती नन्हीं सांसें—प्रकृति के इस नवसर्जन के समय पृथ्वी का प्रत्येक कण जीवन की धड़कन से स्पन्दित हो उठता है।
जैन दर्शन का मूल आधार स्तम्भ है—“अहिंसा परमो धर्मः” और “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” अर्थात् सभी जीव एक-दूसरे पर आश्रित हैं और आपस में एक-दूसरे का उपकार/सहायता करते हैं। एक सामान्य गृहस्थ वर्षा ऋतु में अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रहता है, किन्तु एक जैन साधु, जिसने सम्पूर्ण जगत् के जीवों को अभयदान देने का महान व्रत धारण किया है, वह इस मौसम में चलने-फिरने को भी एक अदृश्य हिंसा का कारण मानता है।सोचिए! जब कोई जीव गीली मिट्टी या हरी घास पर कदम रखता है, तो उसकी आंखों से ओझल न जाने कितने नन्हें जीव उसके पैरों के नीचे आकर प्राणान्त हो सकते हैं। जल की बूंदों में, जिन्हें जैन दर्शन में ‘अपकाय’ (जल-कायिक) जीव कहा गया है, हवा में ‘वायुकाय’ और वनस्पतियों में ‘वनस्पतिकाय’ जीव होते हैं, इन सब में प्राण होते हैं। इसलिए, जैन साधु अपनी यात्रा रोक देते हैं ताकि उनके चलने से किसी भी नन्हें, असहाय जीव के प्राणों को आघात न पहुंचे। यह रुकना उनकी किसी शारीरिक थकावट का परिणाम नहीं है, यह तो उनकी असीम करुणा का बहता हुआ निर्झर है। “साधु के चरण इसलिए नहीं रुकते कि उनकी यात्रा समाप्त हो गई है; वे तो इसलिए रुकते हैं कि किसी सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की जीवन यात्रा असमय समाप्त न हो जाए।”
‘ईर्यासमिति’ और सूक्ष्म विवेक का सर्वोत्कृष्ट रूप—
अहिंसा का पालन केवल ऊपरी तौर पर नहीं होता; जैन साधु की हर एक क्रिया में सूक्ष्मता और सजगता का जो स्तर दिखाई देता है, वह किसी भी संवेदनशील हृदय को नतमस्तक कर देता है। जैन आचरण शास्त्र में साधु के जीवन के लिए ‘समिति’ और ‘गुप्ति’ का विधान है। इनमें से एक है—‘ईर्यासमिति’, जिसका अर्थ है- बहुत अच्छे से देख-भालकर और सावधानी-पूर्वक चलना।
जैन साधु मार्ग में चलते समय चार हाथ (लगभग 6 फीट) आगे की भूमि को निरन्तर देखते हुए चलते हैं। यदि रास्ते में कोई चींटी, कीड़ा या हरी घास हो, तो वे अपना मार्ग बदल लेते हैं या कदम रोक लेते हैं। वर्षा काल में चूंकि पूरी पृथ्वी ही सूक्ष्म जीवों का बसेरा बन जाती है, अतः इस समय मार्ग पर चलना ‘ईर्यासमिति’ का पूर्णतया पालन करने में बाधा उत्पन्न करता है। इसी सूक्ष्म विवेक के कारण जैन आगमों में वर्षा के चार महीनों में एक स्थान पर ही ठहरने (चातुर्मास) का कठोर विधान बनाया गया है।
साधु जीवन की सूक्ष्म अहिंसा:
* दिन में एक बार आहार (भोजन): दिगम्बर साधु सूर्योदय होने के 3 घड़ी बीत जाने के बाद से लेकर सूर्यास्त होने के 3 घड़ी पहले तक ही दिन में एक बार ग्रन्थों में कही गई विधि के अनुसार शुद्ध, प्रासुक, मर्यादित एवं सात्विक अन्न-जल ग्रहण करते हैं।
* खड़े होकर चर्या : मुनिराज किसी थाली या बर्तन में नहीं, बल्कि अपने दोनों हाथों को मिलाकर बनाई गई अंजुली को पात्र बनाकर खड़े-खड़े आहार लेते हैं।
* शुद्ध सात्विक भोजन : भोजन पूरी तरह शुद्ध-शाकाहारी होता है जिसमें कन्द-मूल (आलू, प्याज, लहसुन आदि) के साथ बहुत से अब अभक्ष्य पदार्थ का त्याग होता है।
* अन्तराय (बाधा) : आहार के दौरान यदि कोई अशुद्धि जैसे बाल या कीट आ जाए या कोई अन्य बाधा हो, वे उसी समय भोजन लेना छोड़ देते हैं।गति में विश्राम, किन्तु साधना में तीव्र प्रवाह—
प्रायः लोग सोचते हैं कि रुक जाना प्रगति का अन्त है, किन्तु जैन दर्शन की दृष्टि भिन्न है। चातुर्मास में साधु के केवल ‘चरण’ रुकते हैं, उनकी ‘साधना’ नहीं। उनका ‘शरीर’ एक स्थान पर स्थिर होता है, किन्तु उनकी ‘वाणी’ और ‘धर्म-प्रभावना’ देश-काल की सीमाओं को लांघकर अनगिनत हृदयों में यात्रा करती है।
वर्ष के आठ महीनों में साधु निरन्तर पदयात्रा (विहार) करते हुए समाज के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में धर्म की अलख जगाते हैं, किन्तु चातुर्मास के ये चार महीने उनके लिए ‘आत्म-निरीक्षण’ और ‘तपस्या’ के महीने होते हैं। जिस प्रकार एक किसान वर्षा काल में अपनी फसल को सींचता है, उसी प्रकार श्रावक और साधु मिलकर चातुर्मास में अपनी आत्मा की खेती को स्वाध्याय, व्रत, उपवास और ध्यान के जल से सींचते हैं।
इन चार महीनों में जैन साधु उग्र तपश्चर्या करते हैं। कई-कई दिनों का उपवास, मौन साधना और कठिन तपस्या उनके जीवन का अंग बन जाता है। जो समाज पूरे वर्ष सांसारिक भाग-दौड़, धन, पद और प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में खोया रहता है, वह साधुओं के सानिध्य में आकर ठहराव का अनुभव करता है।
चातुर्मास का सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव—भारत की वास्तविक आत्मा उसके त्याग और सेवा भाव में बसती है। चातुर्मास उसी त्याग का वार्षिक उत्सव है। जब किसी नगर या ग्राम में जैन सन्तों का चातुर्मास होता है, तो वहाँ का सामाजिक वातावरण पूरी तरह बदल जाता है:
* व्यसन मुक्ति और संस्कारों का पुनर्जागरण : साधुओं के ओजस्वी प्रवचनों को सुनकर कितने ही लोग शराब, मांस, जुआ और गलत कामों जैसे व्यसनों का त्याग कर देते हैं। जो मन कल तक क्रोध और लोभ से भरा था, वह क्षमा और सन्तोष की ओर मुड़ने लगता है।
* करुणा का प्रसार : चातुर्मास के दौरान केवल जैन ही नहीं, बल्कि अजैन भाई-बहन भी अहिंसा और जीव दया के इस पावन सन्देश से प्रभावित होते हैं। मूक पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी, गौशालाओं का सञ्चालन और पीड़ितों की सेवा के कार्य चातुर्मास के दौरान तीव्र गति पकड़ते हैं।
* क्षमावाणी पर्व : चातुर्मास के मध्य में ही जैन धर्म का सबसे महान पर्व ‘पर्युषण’ आता है, जिसका अन्तिम दिन ‘क्षमावाणी’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन व्यक्ति अपने अतीत के सारे वैर-विरोध भूलकर, जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए छोटे-बड़े सभी जीवों से हाथ जोड़कर क्षमा मांगता है—“तस्स मिच्छामि दुक्कडं”। यह पर्व मानसिक तनावों को मिटाने और सामाजिक सम-रसता स्थापित करने की दिशा में एक अद्वितीय उदाहरण है।मानवता के लिए चातुर्मास का चिरन्तन सन्देश —
आज का आधुनिक मानव एक ऐसी दौड़ में शामिल है, जहाँ न कोई मंज़िल नज़र आती है, न ही कोई विराम। हम बाहर की दुनिया को जीतने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने भीतर झांकने का समय ही नहीं बचा। तनाव, डिप्रेशन और आपसी कटुता का मूल कारण यही है कि हमारे जीवन में ‘ठहराव’ समाप्त हो चुका है।
जैन साधुओं का चातुर्मास सम्पूर्ण विश्व-मानवता को पुकार-पुकार कर यह सन्देश देता है— “हे मानव! ठहर जाओ। अपनी अंधी दौड़ से थोड़ा विश्राम लो। जब तुम्हारे कदम रुकेंगे, तभी तुम्हारा मन शान्त होगा और जब मन शान्त होगा, तभी तुम्हें अपनी आत्मा की वह मधुर धड़कन सुनाई देगी और परमात्मा की अनुभूति होगी।”
चातुर्मास केवल जैनियों का पर्व नहीं है; यह तो सम्पूर्ण जीव-जगत के संरक्षण, पर्यावरण की रक्षा और आत्मानुभूति का एक वैश्विक वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक दर्शन है। आइए, इस चातुर्मास में हम भी अपने भीतर के विकारों का त्याग करें, जीवों के प्रति करुणा का दीप जलाएं और अपने जीवन को संयम तथा अहिंसा के प्रकाश से आलोकित करें।*ब्राह्मी लिपि प्रचारक, श्रुताराधक सन्त*
*क्षुल्लक श्री प्रज्ञांशसागर जी गुरुदेव*
चंडीगढ़
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