मनमोहन सिंह ‘दानिश’
अब बताओ पूरी दुनिया, या यूं कहूँ की सभ्य समाज पुलिस के पीछे पड़ गया। इल्ज़ाम है कि दिल्ली पुलिस के एक बड़े अफसर ने लड़की छेड़ दी। तो इस पर इतना बवाल क्यों? असल में लोग भूल जाते हैं, हमारे ये बहादुर पुलिस वाले तो थानों में बलात्कार तक कर देते हैं। यहां तो उस बेचारे से लड़की “छिड़” गई। उसने कोई जानबूझ कर तो छेड़ा नहीं। और फिर जो काम पुलिस के अफसर ने किया उतना तो इनके कांस्टेबल तक कर देते हैं। हां, अफसर का यह कृत्य सिपाहियों के दायरे में “ट्रेसपासिंग” ज़रूर है। जाहिर है पुलिस के सिपाहियों को अफसर की यह हरकत नागवार गुज़री होगी। लड़की छेड़ने का कार्यक्षेत्र तो सिपाहियों या हवलदार या होमगार्ड के जवानों का है, अगर यहां भी अफसर घुस गए तो ये बेचारे सिपाही कहां जाएंगे? उनका दुख कोई समझता ही नहीं।
मेरे ख्याल में सिपाहियों को यह मुद्दा अपनी मीटिंग में उठाना चाहिए। और एक सीमा रेखा खींचनी चाहिए कि कौन से काम अफसर करेंगे और कौन से सिपाही? ताकि आपस में तालमेल बना रहे। इस मामले में गुंडे बदमश, जेबकतरे, चोर और लुटेरे बहुत सही हैं। उन्होंने अपने अपने इलाके बांट रखे हैं। किसी भी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए आपसी तालमेल ज़रूरी है। अब जंतर मंतर पर पुलिस अफसर ने जो हरकत की वह उसके स्टेटस के अनुरूप नहीं थी। उसे तो बलात्कार जैसा कोई बड़ा काम करना चाहिए था। ये महिलाओं को छेड़ना उधर हाथ लगाना उन्हें शोभा नहीं देता। दिल्ली के पुलिस अफसरों के “गिरोह” को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए और उस अफसर की आलोचना करना चाहिए। आखिर दिल्ली पुलिस की कुछ अपनी साख है।
खैर, फिलहाल तो पूरी पुलिस, दिल्ली और केंद्र की सरकारों और नौकरशाहों को उस बेचारे मासूम अफसर को बचाने में जुट जाना चाहिए जिस पर यह मुसीबत आ गई है। लोग भड़के हुए हैं। प्रशासन की समस्या यह है कि इस मामले में इनका आई टी सेल भी कुछ नहीं कर पा रहा। घटना का वीडियो सामने है। वे लोग कैसे साबित करेंगे कि वो लड़की खुद को “छिड़वाने” के लिए ही आई थी। समस्या गंभीर है पर जब पूरा तंत्र किसी को बचाना चाहे तो कोई क्या कर सकता है? लेकिन जनता की अदालत अलग तरह से चलती है।
मनोरंजन
Trending