Sunday, 19 July 2026
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‘कॉकरोच’ का सम्मान

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

आजकल ‘कॉकरोच’ काफी महत्वपूर्ण विषय बन गया है। जब से बेरोजगारों की तुलना ‘कॉकरोच’ से हुई है तब से सारे कॉकरोच खुद पर गर्व करने लगे हैं। वे कहते हैं कि अगर वे इस धरती पर नहीं होते तो बेरोजगारों की तुलना किससे की जाती। आज तक किसी ने कॉकरोच को इतनी इज्ज़त नहीं दी थी जितनी उसे अब मिली है। आखिर कोई बुद्धिजीवी ही उसे यह सम्मान दे सकता था। अब पता चला है कि जिनके पास काम नहीं होता, जो रोज़गार दफ्तर के चक्कर काटते रहते हैं वे कॉकरोच की ही श्रेणी में समझे जाते रहेंगे।

वैसे भाषा के मामले में हम ने पिछले कुछ सालों में बहुत तरक्की की है। भाषा की मर्यादा तो अब केवल किताबों तक सीमित होकर रह गई है। हमारी विधानसभाओं, संसद, और अब न्यायपालिका में भी कमाल की भाषा बोली जाती है। आदमी को बिल्कुल बाज़ार जैसा वातावरण लगता है। देश के थानों की भाषा तो पहले से ही उच्च कोटि की है।

पुलिस वाले चाहें तो विभिन्न अवसरों में दी जाने वाली गलियों का पूरा शब्दकोश तैयार कर दें। बड़ी प्रतिभाशाली है हमारी पुलिस। खैर, अब तो ऊपर से नीचे तक भाषा का स्तर एक सा हो गया है। चलो इस मामले तो बराबरी हुई। तो सोचता हूं कि इस तरह की भाषा सिखाने के लिए कोई कोचिंग सेंटर ही खोल लूं। सुना है आजकल कोचिंग सेंटर वाले खूब कमाई कर रहे हैं। उन्हीं की बदौलत पेपर भी लीक होते हैं। मतलब कमाई मोटी है। देख लो मेरे बेरोज़गार दोस्तो धंधा बुरा नहीं है।