Thursday, 10 September 2026
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“कॉकरोच” का “इंटरनेशनल कनेक्शन”

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

बहुत खुशी की बात है कि हमारे “कॉकरोच” का रिश्ता केवल हमसे ही नहीं बल्कि इसका नाता तो दुनियां के दूसरे मुल्कों से भी है। इतिहास को खोजा, उसे पढ़ा तो पता चला कि दुनियां के सबसे बड़े “डेमोक्रेट” एडॉल्फ हिटलर और उसकी नाज़ी पार्टी भी बेरोज़गार युवाओं और यहूदियों के लिए इसी संज्ञा का उपयोग किया करते थे।

वैसे तो पूरी दुनियां में हिटलर को “तानाशाह” कहा जाता है पर मैं उसे इसलिए “डेमोक्रेट” कहता हूं क्योंकि उसने भी चुनावों को जीत कर ही सत्ता हासिल की थी। और उसकी खूबी यह थी कि जब तक हिटलर खुद को गोली मार कर नहीं मारा तब तक लोग उसे देश का सच्चा सपूत और सबसे बड़ा देशभक्त मानते रहे।

यह तो उसके जाने के बाद पता चला कि जर्मनी तो पूरी तरह बर्बाद चुका था। तो युवाओं को “कॉकरोच” तो हिटलर ने कहा था। पर हमारी तरह वहां भी किसी ने हिटलर से यह नहीं पूछा था कि उसके शासनकाल ने इतनी बेरोज़गारी क्यों थी? हम भी कभी यह सवाल सत्ता से नहीं पूछते। बस युवाओं को निकम्मे, नशेड़ी, अपराधी, कामचोर, या उपद्रवी, कह कर उनका अपमान या तिरस्कार कर देते हैं या फिर उन्हें पकौड़े तलने की सलाह दे देते हैं। अब ये युवा पढ़े लिखे हैं तो क्या करें?

अनपढ़ होते तो शायद देश के शिक्षामंत्री बन गये होते। और अगर अनपढ़ होने के साथ साथ अज्ञानी भी होते तो बहुत बड़े साधु बाबा बनकर करोड़ों का धंधा चला रहे होते। पर हमारे युवा तो पढ़े लिखे हैं इसलिए न तो राजनीति में जा सकते हैं और न ही साधु बाबा बन सकते हैं। वे तो व्यवस्था से सवाल कर सकते हैं। ऐसे सवाल जिनसे व्यवस्था अक्सर दूर भागती नज़र आती है।

वही भाषा जो हिटलर ने इन युवाओं के लिए बोली थी अब हमारी सबसे बड़ी अदालत के गलियारों में सुनकी देने लगी है। चलो कुछ भी हो युवाओं को कुछ भी कह दो कहीं जूँ तक नहीं रेंगती पर तसल्ली इस बात की है कि देश सुरक्षित हाथों में है।