चण्डीगढ़ :
इस वर्ष पुरुषोत्तम मलमास 17 मई से प्रारंभ होकर 15 जून तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिस चंद्र मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती, उसे अधिक मास या मलमास कहा जाता है। भगवान विष्णु द्वारा इस मास को अपना नाम दिए जाने के बाद से इसे पुरुषोत्तम मास के रूप में जाना जाता है। पंडित रोशन शास्त्री, जो गढ़वाल सभा, चण्डीगढ़ के संगठन सचिव भी हैं, ने बताया कि नारद संहिता में उल्लेख है कि जिस मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती, उसमें सभी प्रकार के शुभ एवं मांगलिक कार्यों का त्याग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जिसे संतुलित करने के लिए लगभग 32 महीने 16 दिन बाद एक अधिक मास जोड़ा जाता है, ताकि ऋतुओं और महीनों में सामंजस्य बना रहे।
उन्होंने बताया कि पद्म पुराण के अनुसार जब मलमास को किसी देवता ने स्वीकार नहीं किया, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” घोषित किया और कहा कि इस मास में किया गया जप, तप, दान और भक्ति अक्षय फल प्रदान करेगी।
पंडित रोशन शास्त्री के अनुसार निर्णय सिंधु एवं धर्म सिंधु में इस अवधि के दौरान विवाह, यज्ञोपवीत संस्कार, मुंडन, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, नया व्यापार आरंभ, देव प्रतिष्ठा और अन्य मांगलिक कार्यों को वर्जित बताया गया है। उन्होंने कहा कि पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की पूजा, विष्णु सहस्रनाम पाठ, श्रीमद्भागवत श्रवण, दान-पुण्य, व्रत, दीपदान और गोसेवा का विशेष महत्व माना गया है। इस दौरान ब्रह्ममुहूर्त में स्नान तथा तुलसी एवं पीपल के समीप दीप प्रज्ज्वलन करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है। पंडित रोशन शास्त्री ने श्रद्धालुओं से इस पवित्र मास में धर्म, सेवा और भक्ति के कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेने का आह्वान किया।