मनमोहन सिंह ‘दानिश’
एक पुराना गीत है। उसके कुछ मिसरे इस तरह से हैं:
” खुशी की चाह में मैने उठाए ग़म बड़े,
मेरा नसीब कि मेरे कदम जहां भी पड़े,
ये बदनसीबी मेरी भी वहीं चली आई,
जुबां पे दर्द भरी दास्तां चली आई
बाहर आने से पहले खिजां चली आई”यह खूबसूरत गीत आनंद बख्शी ने मर्यादा फिल्म के लिए लिखा था। धुन बनाई थी कल्याणजी आनंद जी ने। गीत की इन लाइनों में जीवन का इक दर्शन है। पर मेरे लिए इसमें एक सीख है। मैने यह सीखा कि हम लोग खुशी को बड़ी बड़ी चीजों में तलाशते रहते हैं। सोचते हैं कि खुशी कोई बड़ी लॉटरी लगने, बहुत पैसा आने, बड़ा पद पाने या बड़ी संपत्ति बनाने में मिलती है। पर हम अपने आसपास लगे खुशियों के ढेर देख नहीं पाते।
मेरे लिए खुशी तभी मिलती है जब हम कुछ देते हैं, किसी के लिए निस्वार्थ भाव से कुछ करते हैं, किसी के उदास मन में थोड़ी सी हंसी भर देते हैं। खुद पर कटाक्ष कर दूसरों को हंसाते हैं। अपने बच्चों की छोटी छोटी उपलब्धियों में खुद को शामिल कर लेते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर सारा दिन अपने घुटनों के दर्द, ब्लड प्रेशर, शक्कर की बीमारी, नींद न आने की शिकायत लगभग हम सभी को है, लेकिन क्या सारा सारा दिन, हर महफिल में, इन बीमारियों पर रोते रहना, या अपने बेटों, बहुओं की नाफरमानियों पर लोगों की सहानुभूति लेते रहना, आपको खुशी देता है? बिल्कुल नहीं।
इस उम्र में कभी गुल्ली डंडा या पिठ्ठू खेल के देखो, पेड़ों से फल चुरा के देखो, किसी रोते हुए को हँसा के देखो, किसी की तरफ सहायता का हाथ बढ़ा के देखो। कुदरत को निहारो, फूलों को देखो, तितलियों, चिड़ियों को घोंसला बनाते देखो। कभी चढ़ता सूरज देखो। जी, जनाब जैसे संबोधन छोड़ कर पुराने दोस्तों को उनके बचपन के नाम चिंटू, मिंटू, कह के पुकारो। याद करो कि आपको सर, आप, श्रीमान, आदरणीय, कहने वाले तो बहुत मिलेंगे, लेकिन “तू” कह कर बुलाने वाले धीरे धीरे खत्म हो जाएंगे। खुशी तो उनसे मिलने से हासिल होती है। खुशी तो गली में कंचे खेलने में थी, कभी अपने अंदर के बच्चे को जगाओ, उससे पूछो खुशी क्या है। जिनके साथ आप क्लबों में जा रहे हैं, धंधा चला रहे हैं वे आपको खाक खुशी देंगे। मुझे याद है जो खुशी मुझे “कच्ची जमात” पास करने पर मिली थी उतना खुश मैं कभी नहीं हुआ। “कच्ची जमात” का अर्थ है आज की नर्सरी क्लास। कभी इनाम में पेंसिल या रबड़ का मिलना जो खुशी देता था वह अनुभूति आज तक मेरे अंदर महसूस है।
यहां एक घटना का ज़िक्र करना चाहूंगा। धर्मपुर में एक बहुत मशहूर मनोचिकित्सक डॉक्टर वीरेंद्र मोहन थे। वे बताते हैं कि एक बार वे अपने ड्राइवर मुनि लाल के साथ चंडीगढ़ से धर्मपुर लौट रहे थे। रात काफी हो गई थी। तो दतियार के पास उन्हें एक स्कूटर खड़ा दिखाई दिया। साथ ही एक परिवार खड़ा था जिसमें एक व्यक्ति उसकी पत्नी और छोटा बच्चा था। उन्होंने इशारा कर हमें रुकवाया। असल में उनके स्कूटर में पेट्रोल खत्म हो गया था। उन्होंने मुझ से सहायता मांगी। उन दिनों नज़दीक का पेट्रोल पंप केवल परवाणू में था। डॉक्टर साहब ने बताया कि मैंने मुनिलाल से कहा कि वह परवाणू जा कर पेट्रोल ले आए। मुनिलाल को यह बात पसंद नहीं आई उसने थोड़ी ना नुकर की पर पेट्रोल लेने चला गया। कुछ देर डॉक्टर साहब उस परिवार के साथ खड़े रहे। खैर मुनिलाल पेट्रोल ले कर आगया। स्कूटर में पेट्रोल डाला। जैसे ही उस स्कूटर वाले ने किक मारी और स्कूटर स्टार्ट हुआ तो उस छोटे से बच्चे ने उछल कर ज़ोर ज़ोर से तालियां बजानी शुरू कर दीं। वह चिल्ला उठा, ” स्टार्ट हो गया”। डॉक्टर साहब ने बताया कि जो खुशी मुझे किस की तालियों ने दी वे उसे कभी नहीं भूले।
तो दोस्तो ग़मों से अधिक खुशियां तुम्हारे इर्द गिर्द बिखरी हैं उन्हें ज़रा समेटो तो सही।
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