लंबी न्यायिक हिरासत और ट्रायल में देरी को माना महत्वपूर्ण आधार
सुभाष जिंदल/चंडीगढ़
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट के एक मामले में आरोपी करनदीप सिंह @ करण को नियमित जमानत प्रदान करते हुए कहा कि किसी भी आरोपी को केवल ट्रायल में अनावश्यक देरी के कारण अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है।
माननीय न्यायमूर्ति सुमीत गोयल की एकलपीठ ने यह आदेश CRM-M-36145-2026 में पारित किया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गोपाल राठी ने प्रभावी पैरवी करते हुए न्यायालय को बताया कि आरोपी लगभग एक वर्ष से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में है तथा मुकदमे की सुनवाई में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ट्रायल में देरी आरोपी के कारण नहीं है, इसलिए उसे अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं होगा।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के कठोर प्रावधानों का सम्मान करते हुए भी, यदि ट्रायल में अत्यधिक विलंब हो और आरोपी के मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हों, तो न्यायालय उपयुक्त परिस्थितियों में जमानत प्रदान कर सकता है। अदालत ने यह भी दोहराया कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है।जमानत मंजूर करते समय न्यायालय ने आरोपी पर कई शर्तें भी लगाई हैं, जिनमें ट्रायल में नियमित उपस्थिति, साक्ष्यों से छेड़छाड़ न करना, कोई नया अपराध न करना तथा प्रत्येक माह शपथपत्र प्रस्तुत करना शामिल है।
विशेष टिप्पणी — अधिवक्ता गोपाल राठी
इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए अधिवक्ता गोपाल राठी ने कहा,”यह निर्णय केवल एक आरोपी को जमानत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र न्याय के अधिकार की पुनः पुष्टि करता है। माननीय हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि ट्रायल अनावश्यक रूप से लंबित रहता है, तो केवल एनडीपीएस अधिनियम की कठोरता के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को अनिश्चितकाल तक प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। यह फैसला भविष्य में ऐसे अनेक मामलों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा, जहाँ अभियुक्त लंबे समय से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद हैं।”
विशेष टिप्पणी — अधिवक्ता गोपाल राठी