Thursday, 10 September 2026
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आखिर व्यंग्य क्या है?

मनमोहन सिंह ‘दानिश’

अभी पिछले दिनों हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने टीवी पर चल रहे एक कॉमेडी शो को दूसरों और साथी कलाकारों का उपहास उड़ाने वाला बतलाया। मैं उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूं। दूसरों का उपहास उड़ाना बहुत आसान है लेकिन खुद पे हसना उतना ही मुश्किल। व्यंग्य और उपहास में बहुत बड़ा अंतर है, व्यंग्य का मतलब किसी बहुत ही गम्भीर बात को इस तरह से कहना कि बात की गम्भीरता बनी रहे और होठों पर हल्की मुस्कान भी आ जाए।

व्यंग्य का मतलब किसी का उपहास उड़ाना नहीं है। व्यंग्य कोई चुटकुला नहीं होता कि लोग हा हा करके हंसने लगें। व्यंग्य सामाजिक सरोकारों की तरफ हमारा ध्यान खींचता है। उस समय की राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को आईना दिखाता है। इस के बारे में मुझे बहुत बड़े व्यंग्यकार स्वर्गीय के पी सक्सेना की कुछ पंक्तियां याद आती हैं। वे लिखते हैं – ” मेरी शादी की बात चल रही थी। मेरे लिए एक लड़की पिता जी ने देखी और एक मैने खुद भी देख रखी थी। जो लड़की पिता जी ने देख रखी थी उसके घरवाले दहेज में साइकिल दे रहे थे। पिता जी लड़की में कम और साइकिल में अधिक “इंटरेस्टेड” थे।

उन दिनों हम पिछड़े हुए थे, कम पढ़े लिखे गँवार थे, इसलिए पिता की बात मान भी लेते थे”। अब इन पंक्तियों में हल्के फुल्के तरीके से उन्हों ने समाज में दहेज के लेने पर तीखा प्रहार किया। बदलते सामाजिक हालात पर भी चोट की। वे कहते हैं – ” हम पिछड़े थे। कम पढ़े लिखे गँवार थे, इसलिए पिता की बात मान भी लेते थे”।

अब इन पंक्तियों में केपी सक्सेना ने बिना किसी और का ज़िक्र किये खुद पर सारी बात लेली। इसलिए व्यंग्य को अपने पे ही लेना पड़ता है। व्यंग्य का मतलब किसी का उपहास उड़ाना नहीं। आजकल के टीवी शो में व्यंग्य को उपहास के रूप में पेश किया जाता है। व्यंग्य में लोग मुस्कुराने के साथ उस पर सोचना शुरू कर देते।क्योंकि व्यंग्य का विषय हमेशा गम्भीर होता है।

उपहास लोगों की गरीबी का, किसी की शारीरिक बनावट का, किसी के कम पढ़े लिखे होने का उड़ाया जाता है। लोग उस फूहड़पन पर खिलखिला के हंस देते हैं, जैसे किसी के गिरने पर अधिकतर लोग उसका मज़ाक बनाते हैं। उपहास किसी दूसरे की भावनाओं का मज़ाक बना कर किया जाता है। व्यंग्य या तंज इंसान खुद पे करता है। वह स्वयं उसका केंद्र बिंदु होता है। एक जगह मशहूर व्यंग्यकार शरद जोशी लिखते हैं – मुझे अपने नावल के लिए एक ऐसी जगह जाना था जहां के लोग गलत हिंदी बोलते हों, हालां की कुछ गलत हिंदी मैं खुद भी लिख लेता हूँ। इसे कहते हैं व्यंग्य।

आज के समय में बहुत अच्छे व्यंग्यकार नहीं मिलते। कृष्णचंद्र की किताब “एक गधे की आत्मकथा” व्यंग्य साहित्य की सबसे बड़ी किताब है। उनके हर अक्षर में आपको व्यंग्य मिलता है। इसी प्रकार शरद जोशी और हरिशंकर परसाई भी कमाल के व्यंग्यकार हुए हैं। इनके शब्दों की धार की तारीफ वे लोग भी करते थे जिन पर इनके व्यंग्य होते थे।

इसी प्रकार कार्टून भी व्यंग्य का और बहुत खूबसूरत तरीका है। आर के लक्ष्मण के कार्टून कमाल के होते थे। उन्होंने पंडित नेहरू पर बहुत कार्टून बनाए और नेहरू से ही उनके कार्टूनों की प्रदर्शनी का उद्घाटन करवाया। पंडित नेहरू ने उनके कार्टूनों की बहुत सराहना की थी।

आज फिर से ज़रूरत है अच्छे व्यंग्यकारों की। उपहास तो कोई भी किसी का उड़ा सकता है।