चंडीगढ, संजय मिश्रा:
जी हाँ सही सुना, अगर आपके घर या जमीन पर किसी ने अवैध कब्जा कर रखा है, तो आप बिना कोर्ट गए इसको खाली करा सकते हैं। प्रॉपर्टी पर अवैध कब्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में सिविल अपील संख्या 4527 ऑफ़ 2009 (पूना राम बनाम मोती राम) को 29 जनवरी 2019 को निस्तारित करते हुए निर्णय के पैरा नंबर 13 में कहा, कि अगर किसी ने अस्थाई रूप से प्रॉपर्टी पर कब्जा कर लिया है, और उस प्रॉपर्टी का मालिक है यानी कि जिस व्यक्ति के नाम से वह प्रॉपर्टी रजिस्टर है वह बलपूर्वक उस कब्जा करने वाले व्यक्ति को अपनी प्रॉपर्टी से बेदखल कर सकता है चाहे कब्जा उसने 12 साल से ज्यादा समय से ही क्यों न कर रखा हो। इसके लिए प्रॉपर्टी के मालिक को कोर्ट में जाने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि कोर्ट की कार्यवाही की जरूरत तभी पड़ती है, जब प्रॉपर्टी बिना टाइटल की हो और संपत्ति पर किसी अन्य का सेटल्ड कब्जा हो।
लेकिन अगर प्रॉपर्टी का टाइटल आपके पास नहीं और कब्जा को 12 साल हो चुके हैं, तो आपको कोर्ट में केस करना होगा। ऐसे मामलों की कानूनी कार्यवाही के लिए विशिष्ट राहत अधिनियम 1963 (Specific Relief Act 1963) बनाया गया है जिसकी धारा 5 के तहत प्रॉपर्टी से गैरकानूनी कब्ज़ा खाली कराने का प्रावधान किया गया है।
PART II
SPECIFIC RELIEF
CHAPTER I
RECOVERING POSSESSION OF PROPERTY
5. Recovery of specific immovable property.—A person entitled to the possession of specific immovable property may recover it in the manner provided by the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908).
कोर्ट ने आगे कहा कि जब कोई व्यक्ति कब्जे की बात करता है, तो उसे प्रॉपर्टी पर कब्जे का टाइटल भी दिखाना होता है, और उसे प्रूफ करना होता है, कि वह प्रॉपर्टी उसकी है और उसी का उस पर कब्जा है।
लेकिन अगर किसी ने किसी की प्रॉपर्टी पर अस्थाई रूप से कब्जा कर लिया है, तो इस तरह के कब्जे को उस प्रॉपर्टी का जो वास्तविक मालिक है, उसके खिलाफ अधिकार नहीं मिल जाता। वास्तविक कब्जा तभी होता है, जब उस प्रॉपर्टी पर बहुत लंबे समय से कब्जा किया हो और उसका जो वास्तविक मालिक है वह चुपचाप बैठा हो।
संपत्ति पर अवैध कब्जा क्या है?
यदि कोई व्यक्ति, जो किसी संपत्ति का कानूनी स्वामी नहीं है, मालिक की सहमति के बिना उस पर कब्जा कर लेता है, तो यह संपत्ति का अवैध कब्जा माना जाएगा। जब तक अधिभोगी के पास परिसर का उपयोग करने के लिए स्वामी की अनुमति है, तब तक व्यवस्था की कानूनी वैधता होगी। यही कारण है कि पट्टे और लाइसेंस समझौतों के तहत किरायेदारों को किराए पर संपत्ति की पेशकश की जाती है, जिसके तहत मकान मालिक किरायेदार को एक विशिष्ट समय अवधि के लिए अपनी संपत्ति का उपयोग करने के लिए सीमित अधिकार प्रदान करता है। इस समय सीमा के बाद परिसर में निवास करना, संपत्ति का अवैध कब्जा माना जाएगा।
प्रतिकूल कब्जा क्या है?
अगर किरायेदार 12 साल से अधिक की अवधि के लिए संपत्ति पर कब्जा करना जारी रखता है, तो कानून भी उसे अवैध कब्जा जारी रखने में सक्षम करेगा। इसे कानूनी भाषा में प्रतिकूल कब्जे के रूप में जाना जाता है। अगर कोई मालिक 12 साल तक अपनी संपत्ति पर अपना दावा नहीं करता है, तो एक स्क्वैटर संपत्ति पर कानूनी अधिकार हासिल कर सकता है। प्रतिकूल कब्जे पर प्रावधान परीसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act 1963) के तहत किए गए हैं।
साल 2010 के हरियाणा राज्य बनाम मुकेश कुमार व अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रॉपर्टी के असली मालिक के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि प्रतिकूल कब्जे का कानून बहुत पुराना है और इसे गंभीरता से देखना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रतिकूल कब्जे के मामले में कब्जा करने वाला जो असल में दोषी है, उसका कानूनी तौर पर संपत्ति पर अधिकार हो जाता है। कोर्ट ने इस कानूनी व्यवस्था को गैरकानूनी गड़बड़ी करार दिया था।
इसलिए प्रतिकूल कब्जे की स्थिति में असली प्रॉपर्टी मालिक, जिसके पास प्रॉपर्टी के दस्तावेज मौजूद है, विशिष्ट राहत अधिनियम 1963 की धारा 5 एवं 6 के तहत कोर्ट से राहत की मांग कर सकते हैं, जिसके तहत अपनी संपत्ति से बेदखल व्यक्ति पिछले कब्जे और बाद में अवैध कब्जे को साबित करके अपना अधिकार वापस ले सकता है।