Sunday, 13 September 2026
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क्या असम विधानसभा चुनाव पर जुबिन गर्ग का मुद्दा छाया रहेगा?

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(MOREPIC1)   नव ठाकुरीया

असम की चुनावी राजनीति अब तक विकास, पहचान, जातीय संतुलन और सुरक्षा जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक असाधारण सवाल सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में खड़ा हो गया है—क्या लोकप्रिय सांस्कृतिक आइकन जुबिन गर्ग की रहस्यमयी मौत चुनावी एजेंडे पर हावी रहेगी?

राजनीतिक दल भले ही सार्वजनिक रूप से यह कहते नज़र आएँ कि किसी कलाकार के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन 19 सितंबर 2025 को सिंगापुर में हुई जुबिन गर्ग की असामयिक मौत और उसके बाद चली जांच व कानूनी प्रक्रिया ने असम की राजनीति में एक भावनात्मक और संवेदनशील धुरी बना दी है। निधन के कई महीनों बाद भी सोशल मीडिया पर न्याय की मांग थमी नहीं है, खासकर युवा वर्ग में यह मुद्दा लगातार उबाल पर है।

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा पर विपक्ष यह आरोप लगा रहा है कि पूरे मामले को शुरू से ही गलत ढंग से संभाला गया। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने जुबिन के मामले को सरकार की जवाबदेही से जोड़ते हुए आक्रामक रुख अपनाया है। असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने ‘चार्जशीट 2026’ जारी कर न केवल जुबिन की मौत की जांच पर सवाल उठाए, बल्कि बढ़ते सरकारी कर्ज़, कथित भ्रष्टाचार, विभिन्न समुदायों से किए गए वादों के अधूरे रहने और सरकारी स्कूलों को बंद किए जाने जैसे मुद्दों को भी सामने रखा।

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के असम दौरे के दौरान यह बहस और तेज़ हो गई। उन्होंने जुबिन को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि महान कलाकार राजनीति से दूर रहते हैं और उनकी मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने गुवाहाटी के पास सोनापुर स्थित जुबिन के समाधि स्थल पर जाकर श्रद्धांजलि दी और मुख्यमंत्री पर ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। यह संदेश राजनीतिक भी था और भावनात्मक भी, जिसका असर चुनावी माहौल पर साफ दिखाई दिया।

कानूनी मोर्चे पर असम पुलिस ने जुबिन की कथित हत्या के मामले में सात लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें आयोजनकर्ता, मैनेजर, बैंड से जुड़े सदस्य, एक पारिवारिक सदस्य और निजी सुरक्षा कर्मी शामिल हैं। शीर्ष पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में गठित विशेष जांच टीम सिंगापुर जाकर साक्ष्य जुटा चुकी है और अदालत में हज़ार पन्नों से अधिक की चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। इसके बावजूद, जांच की दिशा और गति को लेकर सार्वजनिक संतोष नहीं दिखता।

मामले ने तब नया मोड़ लिया जब जुबिन के परिवार ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर विशेष अदालत के गठन और सुनवाई में तेज़ी की मांग की। जुबिन की पत्नी गरिमा सैकिया गर्ग ने सिंगापुर में समुचित राजनयिक हस्तक्षेप पर ज़ोर दिया, ताकि मौत की परिस्थितियों को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब मिल सके। इसी बीच, सिंगापुर के एक प्रमुख अख़बार की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें जुबिन की मौत को दुर्घटना बताया गया, और यहीं से राजनीतिक बहस और तीखी हो गई।

कोरोनर जांच में सिंगापुर पुलिस ने डूबने को मौत का कारण बताया और किसी आपराधिक साज़िश से इनकार किया। इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया कि यदि अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियां आपराधिक तत्व नहीं पातीं, तो असम में शुरू से ‘हत्या’ का नैरेटिव क्यों गढ़ा गया। विपक्ष का तर्क है कि इससे जनता को भ्रमित किया गया।

मुख्यमंत्री शर्मा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि असम पुलिस की जांच स्वतंत्र थी और मामला अदालत में है, इसलिए राजनीतिक अनुमानबाज़ी से बचना चाहिए। सत्तारूढ़ दल ने जुबिन के लिए न्याय की मांग को लेकर राज्य के कई हिस्सों में न्याय यात्राएं भी निकाली हैं, जिससे यह साफ़ होता है कि सरकार भी इस मुद्दे को पूरी तरह राजनीतिक विमर्श से बाहर नहीं रख पा रही।

दिलचस्प यह है कि जुबिन के प्रति संवेदना और न्याय की मांग असम की सीमाओं से बाहर भी पहुँची। देश के अन्य हिस्सों से राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों ने परिवार से मुलाकात की और निष्पक्ष जांच की मांग की। इससे यह मामला केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी न रहकर व्यापक सार्वजनिक सरोकार बन गया है।

अब असली सवाल यह है कि क्या यह भावनात्मक मुद्दा मतदान व्यवहार को प्रभावित करेगा। क्या जुबिन गर्ग का मामला सत्ता-विरोधी भावना को धार देगा, या फिर यह समय के साथ अन्य चुनावी मुद्दों में दब जाएगा? चुनाव नज़दीक आने के साथ यह स्पष्ट होगा कि यह विषय केवल संवेदना तक सीमित रहता है, या सचमुच असम की राजनीति पर छाया रहता है।
(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)