ग़ज़ल
मुहब्बत भी ज़रूरी है इबादत भी ज़रूरी है
चले इस दौर में लेकिन सियासत भी ज़रूरी हैरहो खामोश तुम चाहे यहां हर बात पर लेकिन
अना पर बात जब हो तो बगावत भी ज़रूरी हैबनाओ दोस्त तुम सब को रहो इक साथ मिलजुल के
मगर कमज़र्फ़ लोगों से अदावत भी ज़रूरी हैतिजारत झूठ की करते हकूमत झूठ से चलती
मगर रिश्तों की दुनिया में सदाकत भी ज़रूरी हैकरो इज़हार उल्फ़त का सभी के सामने “दानिश”
जवानी है तो फिर उसमें हिमाकत भी ज़रूरी है— मनमोहन सिंह ‘दानिश’
इबादत: पूजा
अना: आत्मसम्मान
कमज़र्फ़: धूर्त, कमीना
अदावत: दुश्मनी
तिजारत: व्यापार
सदाकत: सच्चाई
हिमाकत: मूर्खता, बेवकूफी
कविताएँ
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